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11 अप्रैल 2019 का दिन खगोलीय विज्ञान के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा। 6 देशों के 200 वैज्ञानिकों ने 2 साल के अथक परिश्रम के बाद 8 टेलिस्कोपों के नेटवर्क (इवेंट हॉरिजन) की मदद से ब्लैक होल की पहली तस्वीर जारी की जोकि खगोलीय विज्ञान के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। यह पूरे ब्रह्मांड का सबसे बड़ा ब्लैक होल है और जहां यह ब्लैक होल हमारे पूरे सौर मंडल से बड़ा है वहीं पृथ्वी से तो 30 लाख गुना ज्यादा बड़ा है।
यह विशालकाय ब्लैक होल जिस आकाश गंगा में हैं, उसका नाम मेसियर 87 है। करीब 10 दिनों तक टेलिस्कोप ने एम 87 के ब्लैक होल की चमकीली रिंग के चारों तरफ बदलाव का अवलोकन किया। सभी टेलिस्कोप ने मिलकर ब्लैक होल के आसपास के कणों से विकिरण की तस्वीर कैद की।
वैसे तो साल 2012 से ही ब्लैक होल की तस्वीर खींचने के प्रयास किए जा रहे थे लेकिन सफलता अब जाकर हाथ लगी। इस ब्लैक होल की तस्वीर के लिए पिछले 2 सालों में सैटलाइटों की मदद से इतना ज्यादा डेटा इक्ट्ठा हो गया था कि उसे इंटरनेट से भेजना नामुमकिन था। फिर ये सारा डेटा हार्ड ड्राइव की मदद से वैज्ञानिकों तक पहुंचाया गया जिसके विश्लेषण के बाद तस्वीर बन पायी। विश्लेषण में वैज्ञानिकों को पाया कि आकाश गंगा के बीच में एक ब्लर सा स्पेस है और उस स्पेस के चारों तरफ एक राउंड और चमकीला रिंग है। ब्लर सा दिखने वाले स्पेस के बारे में वैज्ञानिकों ने बताया कि यही ब्लैक होल है।
क्या होता है ब्लैक होल?
ब्लैक होल ब्रह्मांड में पाया जाना वाला ऐसा पिंड होता है जिसका गुरुत्वाकर्षण बल बहुत ज्यादा होता है। गुरुत्वाकर्षण बल ज्यादा होने की वजह से ही एक सीमा के बाद जिसे कि इवेंट हॉरिजन कहते हैं, इसके अंदर जाने वाली कोई भी चीज कभी बाहर नहीं आ सकती चाहे वो कोई तारा हो, ग्रह हो या स्पेसक्राफ्ट ही क्यों ना हो। यहां तक की प्रकाश भी इसके अंदर जाकर कभी बाहर नहीं आ सकता क्योंकि ये प्रकाश को पूरी तरह से अवशोषित कर लेता है। ब्लैक होल चार तरह के होते हैं- स्टैलर (तारकीय) , इंटरमीडिएट (मध्यम), सुपरमैसिव (विशालकाय) और मिनिएचर (लघु)।
कैसे बनता है ब्लैक होल-
स्टैलर ब्लैक होल सबसे कॉमन ब्लैक होल माना जाता है। इस तरह का ब्लैक होल किसी तारे के खत्म होने से बनता है। तारे के खत्म होने से तात्पर्य यह है कि किसी तारे का ईंधन समाप्त होने से उसका आस्तित्व समाप्त हो जाए। दरअसल किसी तारे को ऊष्मा और प्रकाश उसमें होने वाले हाइड्रोडन फिजन से मिलता है लेकिन जब तारे का हाइड्रोजन समाप्त हो जाता है तो वह धीरे-धीरे ठंडा होने लगता है और फिर तारा अपने खुद के गुरुत्वाकर्षण के कारण अपने आप को संभाल नहीं पाता, ऐसी स्थिति में तारों में एक विस्फोट होता है जिसे सुपरनोवा कहते हैं। सुपरनोवा के बाद तारों में बहुत जबरदस्त गुरुत्वीय खिंचाव शुरू होने लगता है इस खिंचाव की वजह से तारे असाधारण तरीके से संकुचित होने लगते हैं, जिसके परिणामस्वरूप तारे का स्पेस और टाइम दोनों ही विकृत हो जाता है और वो तारा अदृश्य हो जाता है या हम कह सकते हैं कि तारे का आस्तित्व खत्म हो जाता है। तारों की यही स्थिति ब्लैक होल कहलाती है। इन अदृश्य हुए पिंडों को ही हम ब्लैक होल कहते हैं।
वैसे तो ब्लैक होल की परिकल्पना लगभग 200 साल पुरानी है। सबसे पहले ब्लैक होल की परिकल्पना कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जॉन माइकल ने रखी थी जोकि नवंबर 1784 में प्रकाशित हुआ था। इसके बाद साल 1915 में साइंटिस्ट अल्बर्ट आइंस्टिन ने जनरल रिलेटिविटी (सामान्य सापेक्षता) का सिद्धांत प्रतिपादित किया। जिसके मुताबिक प्रकाश पर भी गुरुत्वाकर्षण बल का प्रभाव पड़ता है। आइंस्टिन के सिद्धांत से ब्लैक होल को समझने में बहुत मदद मिली। साल 1974 में साइंटिस्ट स्टिफन हॉकिंग ने ब्लैक होल को लेकर एक सिद्धांत दिया जिसे कि हॉकिंग रेडिएशन के नाम से जाना जाता है, लेकिन वैज्ञानिक प्रमाणीकरण के साथ सबसे पहले ब्लैक होल की पुष्टि साल 1972 में हो पाई जिसका नाम Cygnus X1 था।
Anida Saifi
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