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मानव समाज के लिए सांस्कृतिक विविधता का महत्व समझना बेहद जरूरी है, खासकर ऐसे दौर में जब कई सारे देशों में धार्मिक असहिष्णुता के चलते बहुत सी अप्रिय घटनाए घट रही हैं। शायद यही वजह है कि यूनेस्को दव्वारा विश्व स्तर पर सांस्कृतिक विविधता दिवस मनाने की परम्परा शुरू कई गई है। जी हां, आज यानी 21 मई को विश्व सांस्कृतिक विविधता दिवस मनाया जाता है। ऐसे में इस खास मौके पर आज हम सांस्कृति विविधिता के महत्व और इसकी आवश्यकता पर चर्चा कर रहे हैं।
गौरतलब है कि भारत की संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता ही है सांस्कृति विविधता में एकता का रूप। भारत की वर्तमान संस्कृति में कई सारे सांस्कृतिक विविधताओं, परम्पराओं और विचारों का समावेश है... यहां हर थोड़ी दूरी पर आपको अलग तरह की भाषा, पहनावा और संस्कृति विशेष देखने को मिल जाएगी। जहां देश के अलग-अलग राज्यों की अपनी संस्कृति और कला विशेष है, वहीं हर राज्य के भीतर भी काफी सांस्कृति विविधता का देखने को मिलती है। लेकिन इन सबके बावजूद एक देश के तौर भारतीय संस्कृति की अपनी विशिष्ट पहचान है।
पश्चिम देशों को अभी भी इस विषय में सोचने की जरूरत है, क्योंकि वहां के ज्यादातर देशों में सांस्कृति विविधता के लिए जगह नहीं है। पश्चिम के देशों में दूसरे देशो की संस्कृति के प्रति उदारता बहुत कम देखने को मिलती है, जो कि विश्व शांति और सांस्कतिक समरसता के लिए अहितकारी है। ऐसे में वैश्विक स्तर सांस्कृति समरसता को बनाए रखने के लिए सांस्कृतिक विविधता के महत्व को दुनिया के सभी देशों को समझना चाहिए।
इसी उद्देश्य से साल 2001 में यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन) ने संवाद और विकास हेतु हर वर्ष 21 मई को विश्व सांस्कृतिक विविधता दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। उम्मीद है कि ये दिन सिर्फ इतिहास में दर्ज एक औपचारिक दिवस के रूप दर्ज ना होकर व्यवहारिक रूप में मानवीय सभ्यता के लिए विकासकारी होगा।
Author: Yashodhara Virodai
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