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पीके मुरलीधरन ने वो कर दिखाया है, जो विकास के बड़े से बडे स्तम्भों ने नहीं किया है। आदिवासी बच्चों की शिक्षा के लिए ज़्यादातर एजूकेशन सोसाइटियाँ, आदिवासियों के लिए काम करने वाले एनजीओ और ऐसा ही अन्य स्वतंत्र पत्रकार वस्वयंसेवकों आदि ने अब तक केवल इसके मॉडल ही बनाने में जुटे हैं। हैरानी है कि बहुतों के पास तो इसका कोई मॉडल तक भी नहीं है। ऐसे में आदिवासी बच्चों को शिक्षित कर उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ पाना बहुत ही मुश्किल जान पड़ता है। लेकिन अच्छी बात है कि केरल के पीके मुरलीधरन ने इस मुश्किल काम को आसान कर डाला है।
जी हाँ, वर्ष 1999 में 29 वर्ष की उम्र में जब पीके मुरलीधरन केरल के इडुक्की ज़िले की एक आदिवासी बस्ती नेमानल्कुडी के लिए रवाना हुए तो इन्हें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि इनकी ज़िन्दगी ही बदल जाएगी और इनके इस दलाव के भागीदार वहाँ के आदिवासी बच्चे भी बनेंगे। पीके मुरलीधरन केरल के ज़िला प्राथमिक शिक्षा परियोजना के स्वयंसेवक थे, जब ये नेमानल्कुडी के उस निम्न प्रथमिक विद्यालय में ये पढ़ाने पहुँचे। इसमें 5-15 साल के कुल 35 बच्चे थे। वह स्कूल एक शेड के नीचे था, जहाँ अनाज रखा जाता था। इस स्कूल में एक ब्लैकबोर्ड के अलावा अन्य सभी सुविधाएँ नदारत थीं, फिर भी पीके मुरलीधरन ने पढ़ाना शुरू किया।
जहाँ पीके मुरलीधरन सकारात्मक बदलाव की उम्मीद कर रहे थे, वहीं अचानक स्कूल आने वाले बच्चों का संख्या घटते-घटते तीन रह गयी। बाद में पता चला कि सारे बच्चे वजाकुथु नामक एक उरु आदिवासी बस्ती में चले गये हैं, जहाँ इलायची की खेती चल रही थी।
चूँकि वजाकुथु उन बच्चों के लिए आजीविका का उत्तम क्षेत्र था, इसलिए पीके मुरलीधरन ने वहीं रुककर बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे यहाँ बच्चों की संख्या 55 हो गयी। पीके मुरलीधरन ने अपने जेब से पैसे खर्च करके उनके लिए शिक्षण सामाग्री भी जुटायी। तीन साल बाद उन्होंने आदिवासियों की बोली- मुथवन भी सीख ली और इसके बाद तो मानों उन आदिवासी बच्चों के शिक्षण में क्रांति ही आ गयी। इसके लिए पीके मुरलीधरन को सम्मानित भी किया गया है।
Author: Amit Rajpoot
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