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LED बल्ब का चलन आज लगभग दुनिया के हर उस घर में है, जहाँ बिजली उपलब्ध है। ये सभी लोग पहले पुराने काँच वाला वो बल्ब उपयोग में लाते थे, जिससे पीली रोसनी निकला करती है। लेकिन आज नीली रोशनी देने वाला LED बल्ब हर घर का हिस्सा है, जिसके सफ़ेद झक्क उजाले को लोग पसन्द करते हैं। LED बल्ब की बढ़ती लोकप्रियता और उपयोगिता का एक सबसे बड़ा कारण यह भी है कि इससे रोशनी पाने के लिए हमें बेहद कम वॉट के विद्युत की आवश्यकता होती है। बिजली बचाने के लिए लोग ज़्यादा से ज़्यादा LED बल्बों का यूज़ करें इसके लिए कैंप लगाकर LED बल्ब भी बाँटे गये और जागरुकता लाने के लिए इसका विज्ञापन भी किया गया।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन LED बल्बों से पुराने ज़माने के पीले बल्बों की तुलना में ज्यादा नीली रोशनी निकलती है? आई स्पेशलिस्ट्स की मानें तो एलईडी लाइट्स से निकलने वाली नीली रोशनी आंखों की रेटिना के सेल्स को नुकसान पहुंचा सकती है। इस बात पर ग़ौर करते हुए फ़्रांस में स्वास्थ्य की निगरानी करने वाली एक सरकारी संस्था खाद्य, पर्यावरण और व्यावसायिक स्वास्थ्य और सुरक्षा (ANSES) ने चेतावनी जारी कर दी है। उसने स्पष्ट तौर पर कहा है कि LED बल्बों से निकलने वाली नीली रोशनी से आंखों की रेटीना को नुकसान हो सकता है और प्राकृतिक रूप से सोने की प्रक्रिया भी बाधित हो सकती है।
जी हाँ, आपको बता दें कि एक तीव्र और शक्तिशाली LED प्रकाश 'फोटो-टॉक्सिक' होता है और यह आँखों में स्थित रेटिना की कोशिकाओं को वास्तव में कभी सही न होने वाली हानि पहुँचा सकती है। इतना ही नहीं आपके घर या दफ़्तर में लगी LED बल्ब की रोशनी आपकी दृष्टि की तीक्ष्णता को भी कम कर सकता है। इसलिए बेहतर है कि इंसान ज़्यादा से ज़्यादा नेचुरल लाइट में रहें और आर्टिफ़िशियस लाइट के सम्पर्क से दूरी बनाएँ, लेकिन हमारा औसतन 1-12 घंटे इन्हीं LED बल्बों के बीच गुजरता है।
Author: Amit Rajpoot
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