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महेश आर वी कर्नाटक के रहने वाले एक इंडीनियर हैं। साल 2009 में जब ये पीईएस इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलॉजी में अपने फ़ाइनल ईयर में थे, तो उस दौरान इन्होंने कुपोषण पर कई सारी रिपोर्ट्स पढ़ीं। उस दौरान महेश ने पाया कि देश में 42 प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार हैं, जो कि राष्ट्रीय शर्म है। इसी एक रिपोर्ट ने महेश के जीवन को बदलकर रख डाला। युवा मन ने इसका बाद विचार किया कि इंजीनियर बनकर मैं तो अपने जीवन का लक्ष्य पूरा कर लूँगा, लेकिन इसके बजाय अगर मैं कुपोषण के ख़िलाफ़ काम करूँ और ख़ासकर बाल कुपोषण दूर करने की दिशा में काम करूँ तो इससे देश के असंख्य बच्चों का भला होगा।
कुपोषण की काट ढूढ़ते हुए महेश को एक दिन स्पिरुलिना के बारे में पता चला, जो कि नीरे-हरे रंग का एक शैवाल है। स्पिरुलिना को डाइट सप्लीमेंट के तौर पर लिया जाता है। आपको बता दें कि महज एक ग्राम स्पिरुलिना में पूरे एक किलोग्राम फल या सब्ज़ी के बराबर पोषण क्षमता होती है। स्पिरुलिना की इस अद्भुत पोषण क्षमता के कारण ही अंतरिक्ष यात्रियों को इसे डाइट सप्लीमेंट यानी कि पूरक खाद्य के रूप में दिया जाता है।
बहरहाल महेश ने देशभर के कुपोषित बच्चों को स्पिरुलिना उपलब्ध कराने की ठानी और इसके लिए उन्होंने ‘स्पिरुलिना फ़ाउंडेशन’ नाम से एक संस्था बनाकर अपने घर के पिछुवाड़े स्पिरुलिना उगाने लगे। आजकल महेश साल भर में क़रीब डेढ़ टन स्पिरुलिना उगा लेते हैं। इसके बाद स्पिरुलिना को सुखाकर ये इसके कैप्सूल बनाते हैं और ‘स्पिरुलिना फ़ाउंडेशन’ के द्वारा कुपोषित बच्चों को मुफ़्त में बाँटते हैं।
इसे खाने से बच्चों में तीन महीने के भीतर उनका हीमोग्लोबिंन स्तर बढ़ रहा है। दिलचस्प है कि महेश आर वी ने अब तक देश के 250 शहरों और गाँवों में स्पिरुलिना के 60 लाख कैप्सूल बाँट दिये हैं। सचमुच महेश का ये कार्य दूसरों के लिए एक बड़ी मिसाल है।
Author: Amit Rajpoot
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