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लोकसभा चुनवों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रचंड जीत के बाद आज सिनेमाघरों में उनकी बायोपिक ‘PM नरेंद्र मोदी’ रिलीज हो रही है। यूं तो पीएम की जीत के आगे लोगों के बीच फिल्म को लेकर खासा उत्साह तो देखने को नहीं मिल रहा, लेकिन फिर भी बीजेपी सपोर्ट्स के लिए उनकी ये बायोपिक किसी ट्रीट से कम नहीं है। तो देखना दिलचस्प होगा कि असल पीएम मोदी बंपर हैट्रिक के बाद उनकी फिल्म पर्दे पर क्या कमाल करके दिखाती है।
कहानी-
फिल्म की कहानी पीएम नरेंद्र मोदी के बचपन से लेकर प्रधानमंत्री बनने तक के सफर को पर्दे पर दिखाती है। फिल्म की शुरुआत 2013 की बेजीपी की उस बैठक से होती है, जिसमें नरेंद्र मोदी (विवेक ओबेरॉय) को प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित करने का निर्णय लिया जाता है। यहां से कहानी फ्लैशबैक में चली जाती है, जहां मोदी को एक आदर्श बच्चे के रूप में दिखाया गया है जो अपने पिता की चाय बेचने में मदद करता है। कुछ सीन्स में हम उसे दहेज प्रथा का विरोध करते हुए भी देखेंगे। इसके बाद वह अपने अंदर की आवाज सुनने के लिए सन्यास ले लेते है और पहाड़ों में चले जाते हैं। पहाड़ों में उनकी मुलाकात एक साधु से होती है, जो उन्हें कहता है कि वह वापस अपने शहर लौट जाए और वहां जाकर लोगों की सेवा करें। मोदी वापस आ जाते हैं और RSS जॉइन कर लेते हैं, और यहां से शुरु होता है उनका मुख्यमंत्री बनने का सफर। गुजरात दंगे हो या फिर कैबिनेट मंत्री के भ्रष्टाचार... इस सभी मुश्किलों को पार करके वह प्रधानमंत्री बनने का सफर तय करते हैं। पूरी फिल्म में एक ऐसा मौक नहीं छोड़ा जहां मोदी की जय-जयकार न की गई हो। पूरी फिल्म में उन्हें एक सुपरहीरो के रूप में पेश किया गया है। वहीं बात करें विपक्ष की तो फिल्म में उनका होना केवल मजाक के तौर पर दर्शकों को हंसाने के लिए रखा गया है।
पीएम मोदी की जिंदगी से जुड़े कई अनछूए पहलुओं को जानने के लिए आपको थिएटर्स का रूख करना पड़ेगा।
प्रोफॉर्मेंस- बात अभिनय की करें केवल विवेक का गेटअप फिल्म में उनके काम आया है, लेकिन एक्टिंग के लिहाज से विवेक कहीं-कहीं मोदी का लहजा भूलकर अपने ही अंदाज में डायलॉग बोलते दिखाई देते हैं। मोदी के मां के रोल में जरीना वहाब का काम शानदार है।
डायरेक्शन और स्क्रिप्टिंग-
फिल्म की कमजोर कड़ी फिल्म की राइटिंग और स्क्रिप्टिंग है। फिल्म में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की मजबूत पार्टनरशिप की तो बात की गई है, लेकिन इसपर इतना फोकस नहीं किया गया। वहीं, सपोर्टिंग कास्ट को भी फिल्म में ज्यादा स्क्रीन टाइम नहीं दिया गया। पूरी की पूरी फिल्म मोदी पर इतनी ज्यादा केंद्रित है कि आपको लगने लगेगा आप किसी प्रधानमंत्री की बायोपिक नहीं कोई सुपरहीरो फिल्म देख रहे हैं।
देखें या नहीं-
अगर आप पीएम मोदी का डाय हार्ट फैन हैं, तो आपको ये फिल्म बहुत पसंद आने वाली है। लेकिन अगर आप कंटेट को लेकर फिल्म देखने की प्लानिंग कर रहे हैं तो ये फिल्म आपको कहीं न कहीं निराश करेगी।
हम इस फिल्म को देते हैं 5 में से ढाई स्टार।
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