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भारतीय इतिहास में यह दुर्भाग्य ही माना जाएगा कि अब तक के पुरातत्वविदों ने मूल काशी की पहचान नहीं कर सके हैं। जी हाँ, आपको मालूम हो कि अभी तक जो भी पहचान काशी की बताई गई है वह सोलह आना कपोल कल्पित है। ये बात आपको सुनने में ज़रा आश्चर्यजनक लग सकती है, लेकिन भागलपुर के शोधार्थी आचार्य परशुराम ठाकुर ‘ब्रह्मवादी’ का तो कम से कम ऐसा ही मत है। वो पुराणों के हवाले से दो काशी के उल्लेख बताते हैं और वे हैं गुप्तकाशी एवम् उत्तरकाशी। गुप्तकाशी मंदार मेरु से पश्चिम है तो उत्तरकाशी या बटेश्वर काशी मंदार मेरु से उत्तर।
आचार्य परशुराम ठाकुर का मत कहता है कि भगवान शिव की राजधानी उत्तरकाशी थी, जिसे बटेश्वर काशी (कहलगाँव भागलपुर) के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ गंगा सीधा अभी उत्तर गामिनी 12 किलोमीटर तक हैं। इसी काशी के पूर्व और दक्षिण-पश्चिम कोण पर क्रमशः असीकुंड व असी गाँव है, जो गंभीरा तट पर स्थित है। वहीं उत्तर में वरना नारायणपुर (भागलपुर के पास) उत्तरी कोसी गंगा तट पर अवस्थित है। यहीं पर वरुणेश्वर महादेव अवस्थित है। अत: इसी वरणा और असी के बीच मूल वाराणसी स्थित है।
आपको बता दें कि आचार्य परशुराम ठाकुर पौराणिक, वैदिक व भौगोलिक खोज के आधार पर यह दावा करते हैं है कि मूल आदि काशी बटेश्वर (कहलगाँव, भागलपुर) ही है। आचार्य शंकर के लेखक स्वामी अपूर्वानंद ने भी अपने ग्रंथ में उल्लेख किया है कि मणिकर्णिका का श्मशान घाट बहुत अधिक प्राचीन नहीं है। साल 1760 ई. में लखनऊ के किसी नबाब के हिंदू कोषाध्यक्ष ने बनारस में मौजूदा मणिकर्णिका का थोड़ा सा स्थान ख़रीदकर अपनी माता का वहाँ दाह संस्कार किया था और उसी समय से वह स्थान श्मशान घाट में परिणत हुआ है।
अत: स्पष्ट है कि आचार्य शंकर की जीवनी में जिस मणिकर्णिका घाट का उल्लेख हुआ है वह प्राचीन मणिकर्णिका तीर्थ वर्तमान में बटेश्वर काशी (कहलगांव ) के उत्तर-पूर्वी गंगा मनिहारी घाट (ज़िला- कटिहार) के नाम से प्रसिद्ध है। यहीं प्राचीन मणिकर्णिका घाट है। यहीं आचार्य शंकर मणिकर्णिका काशी बटेश्वर (कहलगाँव) में रहते थे और स्नान करने नित दिन आते थे।
Author: Amit Rajpoot
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