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भारत में मौजूद तीन सदाबहार वनों में से दो तो हॉट-स्पॉट घोषित हो चुके हैं। बचा है केवल एक सम्पूर्ण सदाबहार वन क्षेत्र, जो कि अंडमान निकोबार द्वीप समूह क्षेत्र में फैला है। ऐसे में आप इस द्वीप समूह के किसी भी द्वीप पर कचरे या पिर किसी भी ऐसे कारक को कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं, जो कि यहाँ कि जैव विविधता को ख़तरा पहुँचा रहे हों। लेकिन हमारा दुर्भाग्य ऐसा है कि हमने न तो हिमालय की सबसे ऊँची एवरेस्ट चोटी पर कचरा फैलाया बल्कि सदाबहार वनों का भी कचरा करके आये हैं। यही सब युवा मन गरिमा पूनिया को विचलित कर गया।
अंडमान में एक पत्रिका में बतौर संपादक काम कर रही गरिमा पूनिया साल 2017 में इस द्वीप समूह के नील द्वीप पर छुट्टियाँ मनाने गयी थीं। तब गरिमा पूनिया संदापक नहीं थीं, बल्कि पढ़ाई कर रही थीं। आपको बता दें कि वहाँ नील द्वीप के किनारों पर भी काफी कचरा देखने को मिला। ये सब देखकर गरिमा पूनिया को एकदम से हैरान रह गयीं, जिसने उन्हें परेशान कर दिया। ऐसे में गरिमा पूनिया ने उसी वक़्त ये ठान लिया कि वह इस नील द्वीप को कचरे से मुक्त करके रहेंगी और इसमें फिर से वैसा ही प्राण फूँकेंगी, जैसा कि ये अपनी हेल्दी अवस्था में था।
नील द्वीप की सफ़ाई के लिए गरिमा पूनिया ने काफी त्याग और मेहनत की। जी हाँ, इस क्रम में सबसे पहले तो उन्होंने ब्रिटेन के ससेक्स विश्वविद्यालय में डेवलपमेंट स्टडीज़ में डिग्री लेने के लिए अपनी रवानगी को रद्द कर दिया। इसके बाद से तो गरिमा पूनिया ने नील द्वीप को स्वच्छ बनाने की ठान ही ली। इसके लिए उन्होंने साल 2018 में वापस नील द्वीप जाने का फैसला किया और यहाँ इन्होंने ‘कचरे वाला प्रोजेक्ट’ के ज़रिए अपने काम को अंजाम देना शुरू कर दिया।
इसका परिणाय यह हुआ कि नील द्वीप के पाँच तटों से लगभग 250 किग्रा. कचरा इकट्ठा किया गया। मालूम हो कि अंडमान में क़रीब 1000 से अधिक लुप्तप्राय प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनके लिए ऐसा कचरा नके ताबूत में आख़िरी कील साबित हो सकता था। इस तरह गरिमा पूनिया ने अपने इस काम से एक ऐसी मिसाल पेश की, जिसके बारे में किसी ने सोचा न था।
गरिमा पूनिया जैसे युवा ही इस देश के कर्णदार हैं, जो कल के भविष्य की तस्वीर बनाते हैं. हम ऐसी शख़्सियतों को एडमाायर करते हैं और करना चाहिए।
Author: Amit Rajpoot
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