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रमजान का महीना है, लाखों मुस्लिम भाई-बहन रोजा रखकर अल्लाह की इबादत कर रहे हैं। मुस्लिम समुदाय के लिए ये महीना बेहद ही पाक और रहमत-बरकत वाला होता है। कहते हैं रोजा रखने वाले व्यक्ति को सबाब मिलता है और अल्लाह की रहमत उसपर बरपती है। हालांकि, रोजा रखने वाले अपने नियमों का भी सख्ती से पालन करते हैं, भले ही भूख-प्यास से अपना आपा खो दें, लेकिन रोजा तोड़ने की सोचते तक नहीं है। रोजा रखने का अर्थ ही अपनी आदतों और अपनी सभी इंद्रियों पर नियंत्रण रखना है।
लेकिन, कहते हैं न इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं होता और ये धर्म ही तो है जो हमें सिखाता है कि जरूरतमंदों की जरूरत के लिए हमेशा आगे खड़े रहें। कुछ ऐसी ही मिसाल पेश की है राजस्थान के नागौर जिले के लाडनू के बड़ा निवासी अशरफ खान ने।
जब एक प्रेग्नेंट महिला जिंदगी और मौत के बीच झूल रही थी, तब अशरफ उस महिला के लिए एक फरिशता बनकर आए... जो उनकी मदद के लिए न केवल सामने आया बल्कि उनके लिए अपना रोजा भी खुशी-खुशी तोड़ दिया।
धर्म की आड़ में इंसानियत भूल जाने वाले लोगों के लिए अशरफ किसी मिसाल से कम नहीं है।
अशरफ ने बताया कि उन्होंने व्हाट्सएप पर एक मैसेज देखा कि सुजानगढ़ के रहने वाले सांवरमल जाट भाई की पत्नी सावित्री देवी को B नेगेटिव ब्लड की जरूरत थी। आस-पास के ब्लड बैंक में ये खून मिल नहीं पा रहा था। अशरफ का ब्लड ग्रुप भी B नेगेटिव था, फिर क्या था... बिना कुछ सोचे समझे वह खून देने निकल पड़े। उन्होंने डॉक्टर्स को कहा कि वह रोजे से हैं, तो शाम को रोजा तोड़कर खून दे देंगे। तब डॉक्टर ने बताया कि मामला बेहद सीरियस है, थोड़ी-सी भी देरी महिला की जान ले सकती है। उन्हें अभी खून की जरूरत है और अशरफ को खून देने के लिए अपना रोजा तोड़ना पड़ेगा। डॉक्टर्स की बात सुनकर अशरफ ने सोचने में पल भर भी न लगाया और इंसानियत के खातिर रोजा तोड़ते हुए उसने नाश्ता किया और खून देकर सावित्री की जान बचा ली।
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