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भारतीय सिनेमा दुनिया भर में सबसे समृद्ध इंड्स्ट्री के रूप में जानी जाती है और इसका बहुत कुछ श्रेय उन महान फिल्म मेकर्स को जाता है, जिन्होने सिनेमा को ना सिर्फ व्यसाय बल्कि अपना धर्म माना। पृथ्वीराज कपूर भी इनमें से एक हैं, जिन्होने 19वीं सदी के शुरूआती दशकों में हिंदी सिनेमा के लिए अभूतपूर्व योगदान दिया। यही वजह है कि उन्हें भारतीय सिनेमा के ‘माइलस्‍टोन’, ‘सिकंदर’ और ‘युगपुरूष’ जैसे उपनामों से पुकारा गया। आज पृथ्वीराज कपूर के पुण्यतिथि के अवसर पर हम हिंदी सिनेमा में उनके इसी योगदान और उपलब्धियों को याद कर रहे हैं।
पृथ्वीराज कपूर का जन्म 3 नवंबर, 1906 में पाकिस्तान के ज़िला फैसलाबाद में हुआ था। यहीं से शुरूआती स्कूली पढ़ाई के बाद उन्होंने पेशावर के एडवर्ड्स कॉलेज से वकालत का कोर्स किया, पर वकालत उनको कुछ खास रास नहीं आई, क्योंकि आर्टिस्टिक मिजाज के पृथ्वी का मन तो अभिनय में रमता था। ऐसे में वो काम के साथ ही लायलपुर में नाटक भी करते रहे।
वैसे पृथ्वीराज की पर्सनॉलिटी भी काफी आकर्षक थी। गोरा रंग, छह फुट दो इंच की ऊंचाई के साथ ही वो दमदार आवाज़ के मालिक थे। पर्दे पर उनका व्यक्तित्व निखर कर आता था... ऐसे में अभिनय की दुनिया में छाने की चाह लिए उन्होने 1928 में लायलपुर से बम्बई की ट्रेन पकड़ ली, जिसके बाद शुरू हुआ पृथ्वीराज कपूर की जिंदगी का असली सफर।
मुम्बई आने के बाद वो इंपीरियल फिल्म्स कंपनी के साथ जुड़ गए, जहां शुरुआत में उन्होने की छोटे मोटे रोल किया पर बाद में कंपनी मालिकों की नज़र उन पर पड़ी तो उन्हें 1929 में आई ‘सिनेमा गर्ल’ फिल्म में मुख्य किरदार मिला। हालांकि ये अभी मूक सिनेमा का दौर था जहां उन्होंने ‘दोधारी तलवार’, ‘शेर-ए-अरब’ जैसी फ़िल्मों में काम किया। इसके बाद 1931 में जब हिंदुस्तान की पहली बोलती फिल्म ‘आलमआरा’ बनी तो इसमें भी पृथ्वीराज कपूर ने एक अहम किरदार निभाया।
वैसे पृथ्वी राज कपूर के करियर और हिंदी सिनेमा के लिए मील का पत्थर साबित हुई साल 1941 में आई फिल्म ‘सिकंदर’। इस फिल्म में अपने दमदार अभिनय और शानदार शख्सियत के दम पर पृथ्वी राज कपूर ने सिकंदर के किरदार में जान फूंक दी। पर्दे पर जिसने में भी पृथ्वीराज कपूर को देखा मानो उसके लिए सिकंदर जीवत हो उठा हो।
इसके बाद तो उन्होने अपने अभिनय के दम पर हिंदी सिनेमा की दुनिया में कई माइल स्टोन स्थापित किए। 1960 में आई ‘मुग़ल-ए-आज़म’ में ‘अकबर’ के किरदार के साथ भी पृथ्वीराज कपूर ने वहीं किया, जिसके लिए आने वाली कई पीढ़ियो के जेहन में वे अकबर के रूप में बस गए।
इसके अलावा बात 1964 में आई फिल्म 'जिंदगी' की हो या फिर 1965 में 'आसमान महल' या फिर 1952 में आई 'आवारा' की, हर फिल्म में उनका किरदार यादगार बन गया।
साल 1971 में आई फिल्म 'कल आज और कल' उनके करियर का आखिरी फिल्म थी, जिसमें पृथ्वी राजकपूर के साथ कपूर खानदान की तीन पीढ़िया नजर आई थीं। इस फिल्म में पृथ्वीराज कपूर, उनके बेटे राजकपूर और पोते रणधीर कपूर तीनों ने काम किया था। साल 1971 में ही 29 मई 1971 को पृथ्वीराज कपूर इस दुनिया को अलविदा कह गये।
लेकिन इस दुनिया को छोड़ने से पहले पृथ्वीराज कपूर, लगभग 40 सालों में हिंदी सिनेमा के लिए वो सब कुछ कर के चल गए जो आने वाले सैकड़ों सालों तक याद किया जाएगा। भारतीय सिनेमा में पृथ्‍वीराज कपूर के इसी महान योगदान के देखते हुए उन्हें साल 1969 में पद्म भूषण अवॉर्ड और फिर मरणोपरांत दादा साहब फाल्‍के पुरस्‍कार से सम्मानित किया गया था।
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