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पृथ्वीराज कपूर को भारतीय रंगमंच और हिंदी फिल्म उद्योग का अगुवा माना जात है। जी हाँ, यूँ तो भारतीय सिनेमा का पितामह दादा साहब फाल्के थे, लेकिन उनके बाद हिन्दी सिनेमा को लेकर आगे बढ़ने वाले कोई और नहीं बल्कि पृथ्वीराज कपूर ही थे। आपको बता दें कि पृथ्वीराज कपूर का जन्म 3 नवम्बर, 1906 को वर्तमान के पाकिस्तान के फैसलाबाद समुंदरी में हुआ था। इनके बचपन का नाम पृथ्वीनाथ कपूर था, जो कि आगे जाकर पृथ्वीराज कपूर में परिवर्तित हो गया। आपको बता दें कि पृथ्वीराज कपूर के पिता बागेश्वरनाथ कपूर पेशावर शहर में भारतीय इंपीरियल पुलिस के एक अधिकारी के रूप में काम करते थे। तब इनके दादा जी समुंदरी के तहसीलदार हुआ करते थे।
दिलचस्प है कि पृथ्वीराज कपूर को साल 1969 में भारत के पद्मभूषण के तौर पर सम्मानित किया जा चुका है। इसके अलावा साल 1971 में इन्हें हिन्दी सिनेमा में अभूतपूर्व योगदान के लिए दादा साहब फाल्के अवॉर्ड से भी नवाजा जा चुका है। आपको बता दें कि पृथ्वीराज कपूर के फ़िल्मी सफ़र की शुरुआत हुयी थी साल 1928 में जब पेशावर से चली फ़्रंटियर मेल बंबई के कोलाबा स्टेशन पर रुकी थी औऱ जेब में मजह 75 रुपये, हाथ में हॉकी स्टिक और सूटकेस लिये हुये 21 साल का नौजवान प्लेटफ़ार्म पर उतरा था। इस शहर में इन्हें पहली फ़िल्म ‘एक्स्ट्रा’ में काम का पहला मौक़ा मिला था।
पृथ्वीराज कपूर का फ़िल्म मुग़ल-आज़म से जुड़ा एक क़िस्सा बड़ा मशहूर है, जब इस फ़िल्म के एक सीन में अकबर अजमेर शरीफ़ में मन्नत माँगने के लिए गरम रेत से होकर चलके जाते हैं। चूँकि पृथ्वीराज कपूर अभिनय के दौरान अधिक से अधिक रियल रहा करते थे, इसलिए उन्होंने गरम रेत पर चलने वाले इस सीन को सच में किया और इसके लिए वह स्वयं गर्म रेत पर चले थे। आज पृथ्वीराज कपूर इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन हिन्दी सिनेमा का रोम-रोम उनसे सदा प्रेरणा लेता रहेगा।
Author: Amit Rajpoot
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