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बुद्ध अपने शिष्यों के साथ उपदेश देने जा रहे थे, तबी देखा कि एक युवक बहुत ही तेज़ी से आवेश के साथ पहाड़ी की तरफ जा रहा है। वह उसे देकते ही समझ गये कि वह युवक या तो किसी की हत्या करने जा रहा है या फिर वह स्वयं की हत्या करने जा रहा है। यह समज बुद्ध ने उस युवक को आवाज़ लगाई। लेकिन वह युवक नहीं रुका। अंत में बुद्ध उसके पीछे-पीछे गये। वह युवक जैसे ही कूदने वाला था, वैसे ही बुद्ध ने उसका हाथ पकड़कर खींच लिया। बुद्ध को सामने देखकर वह युवक बोला- यह मेरा जीवन है, आपको इसमें दखल देने की कोई ज़रूरत नहीं है।
बुद्ध ने उस युवक की बात को सुना और पिर धीरे से मुस्कुराये। बुद्द बोले- ठीक है, तुम आत्महत्या करना चाहते हो तो करो, लेकिन पहले थोड़ा रुको और 10 बार गहरी साँसें लेकर अपनी हथेलियाँ खोल दो। वह युवक बोला- बुद्ध मुझे और न परेशान करो, मैं पहले से ही काफी परेशान हूँ। बुद्ध नहीं मानें और अंत में युवक ने आँखें बंद करके 10 बार गहरी साँसें ली और अपनी हथेलियाँ खोल दी। इसके बाद बुद्द ने उससे कहा कि जाओ अब तुम आत्महत्या कर सकते हो।
युवक फौरन पीछे मुड़ा और आत्महत्या करने के लिए पहाड़ी के एकदम किनारे पहुँचा कि अचानक नीचे देखकर रुक गया। वह पीछे मुड़ा और बुद्ध को देककर बोला- ये क्या हुआ बुद्ध, मैं क्यों रुक गया। मेरे भीतर भय को उत्पन्न हो गया है? बुद्ध मुस्कुराए और बोले- अब तुम्हारे भीतर का क्रोध कमज़ोर हो गया है। तुम्हारे भीतर क्रोध की नकारात्मक ऊर्जा से सकारात्मक ऊर्जा में बदल गयी है और अब तुम्हारा बुद्धि पर नियंत्रण आ चुका है।
Author: Amit Rajpoot
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