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लीडर समाज का नेतृत्व करता है। वह मौजूद या उपस्थित संसाधनों के आधार पर ही लक्ष्य के लिए आगे बढ़ता है, जबकि किसी मैनेजर में ये गुण नहीं होते हैं। वह उपस्थित संसाधनों का प्रबंधन करके चीज़ों को चलायमान करने भर के लिए उत्तरदायी होता है, जबकि नेतृत्व करने वाले किसी लीडर में अनिश्चित संभावनाएँ छिपी होती हैं और वह परिवर्तन को जन्म देता है। आज ये देखना बड़ा दुःखद है कि हमारे समाज में अब लीडर नहीं हैं, बल्कि जहाँ देखो वहाँ मैनेजर ही मैनेजर नज़र आते हैं। हर मसले पर लोग बस यह खोज रहे हैं कि अमुक कार्य को कोई इंसान व्यवस्थित ढंग से मैनेज कर पाएगा कि नहीं। वास्तव में यह मैनेजर का लक्षण होता है। लीडर तो मुक्त स्वभाव का व्यक्ति होता है।
आपको बता दें कि मैनेजर वह व्यक्ति होता है, जिसे सब कुछ दे दिया जाये अथवा सभी तरह के संसाधनों से उसे भरपूर कर दिया तब जाकर वह कुछ करे। कहने का मतलब जिस व्यक्ति को हम सारे संसाधन देकर काम कराते हैं वह व्यक्ति मैनेजर होता है, लेकिन वहीं जो व्यक्ति किसी काम को करने के लिए किसी संसाधन पर निर्भर नहीं रहता है अथवा ज़रूरी संसाधनों का निर्माण वह स्वयं करता है, तो ऐसा व्यक्ति यक़ीनन लीडर कहलाता है।
उदाहरण के तौर पर तेत्रायुग में जब भगवान राम को वनवास के समय नके पिता दशरथ ने कहा कि हे राम! वन में अनेक राक्षस मिलेंगे, इसलिए तुम अपने साथ सेना को भी लेकर जाओ। तब श्रीराम ने कहा कि यदि मैं सेना लेकर गया तो फिर क्या फ़ायदा! मैं जहाँ जाउँगा वहीं अपनी सेना का निर्माण करुँगा, वहीं अपने लिए अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण भी करुँगा। जहाँ जुँगा वहीं संसाधन जुटाउँगा। श्रीराम जी की यही बात उन्हें एक नेतृत्वकर्ता के रूप में प्रदर्शित करती है। कहने का मतलब यह है कि एक लीडर जहाँ जाता है वहीं अपनी व्यवस्था बना लेता है, जबकि एक मैनेजर बिना व्यवस्था के कहीं क्षण मात्र भी नहीं टिक पाता।
Author: Amit Rajpoot
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