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आज देशभर में ईद-उल-फित्र का त्यौहार बड़े ही हर्षो-उल्लास से मनाया जा रहा है, जिसे मीठी ईद के नाम से भी जाना जाता है। मीठी ईद का नाम सुनते ही जहन में सबसे पहले सेवइयां और स्वादिष्ट पकवान आ जाते हैं। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार जो ईद साल में पहले पड़ती है, उसे मीठी ईद यानी ईद-उल-फित्र कहा जाता है। वहीं इस ईद के 70 दिन बाद ईद-उल-अजहा मनाया जाता है, जिसे बकरीद कहा जाता है। मुस्लिम समुदाय में दोनों को ही ईद कहा जाता है और दोनों ही त्यौहारों को बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है।
ईद-उल-फित्र और ईद-उल-अजहा में अंतर तो समझ आ गया, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर ये ईद मनाई क्यों जाती है? हर त्यौहार का एक मकसद और इतिहास होता है... तो ये ईद क्यों मनाई जाती है? इसकी शुरुआत कब हुई?
अगर आपके जहन में भी इस तरह के सवाल आते हैं, और जवाब नहीं मिल पाता... तो मायूम न होना... क्योंकि ईद के पाक अवसर पर हम आज आपके लिए इसका जवाब लेकर आए हैं।
ऐसे हुई थी ईद-उल-फित्र की शुरुआत-
जैसे की सभी जानते हैं रमजान के दौरान 30 दिन रोजा रखने के बाद चांद देखकर ईद का त्यौहार मनाया जाता है। इसे ‘ईद-उल-फित्र’ कहा जाता है। हालांकि, इसे सबसे पहले किसने और क्यों मनाया इसके पीछे एक लंबी कहानी है। कहा जाता है कि पैगम्बर हजरत मुहम्मद ने बद्र के युद्ध में जीता हासिल की थी और इसी जीत के जश्न में ये त्यौहार मनाया जाता है। कहते हैं सबसे पहली ईद-उल-फित्र 624 ईस्वी में मनाई गई थी।
इस दिन की शुरुआत ही मस्जिद में नमाज अदा करने के साथ की जाती है और हर मुसलमान का फर्ज होता है कि वह इस दिन अपनी हैसियत के मुताबिक जरूरतमंदों को दान करे।
30 दिन रोजे के दौरान भूखा-प्यासा रहकर अल्लाह की इबादत करने के बाद इस दिन हर कोई मीठी सेवइयां और स्वादिष्ट पकवान न सिर्फ खुद खाते हैं बल्कि दोस्तों व रिश्तेदारों को भी खिलाते हैं।
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