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यदि पलायन पर रोक लगाना है तो नई तकनीकों और विचारों के साथ गाँवों की ओर लौटना होगा। जी हाँ, आज गाँव की ओर पुराने तरीक़ों से लौटने भर से काम चलने वाला नहीं है, इसके लिए हमें तकनीक भी चाहिए। ये बात कनिका शर्मा को जब समझ में आयी तो उन्होंने दिल्ली और गुरुग्राम की सुख और सुविधा वाली ज़िन्दगी को सिर्फ़ इसलिए छोड़कर गाँव वापस लौट गयीं, क्योंकि वह अपने गाँव के किसानों के लिए कुछ करना चाहती थीं। आपको बता दे कि कनिका शर्मा उत्तराखण्ड के मुक्तेश्वर की रहने वाली हैं। अपनी स्कूली शिक्षा इन्होंने नैनीताल और रानीखेत से पूरी की।
कनिका शर्मा ने अपनी पढ़ाई ख़त्म करके एमबीए की भी पढ़ाई की और फिर गुरुग्राम की एक मल्टी नेशनल कंपनी में काम किया। यहाँ से वह जब भी समय मिलता तो अपने माता-पिता से मिलने नैनीताल पहुँच जाती थी, लेकिन इस दौरान इन्होंने पाया कि इनकी ज़िन्दगी तो बड़े आराम से गुजरती चली जा रही है, लेकिन जीवन में इन्हें सुकून नहीं मिल पा रहा है।
आपको बता दें कि ख़ासतौर से दिल्ली और गुरुग्राम जैसे शहरों में तो वैसा सुकून बिल्कुल भी नहीं है, जैसा कि पहाड़ों और वादियों में है। इसी कशमकश में कनिका शर्मा ने शहर छोड़ दिया और यहाँ की अपनी नौकरी भी। उन्होंन तय किया कि वह गाँव जाकर किसानों को जैविक खेती के बारे में जागरुक करेंगी और किसानों के हित में काम करेंगी।
कनिका शर्मा अपनी बहन कुशिका शर्मा जो कि स्वयं दिल्ली में एक मल्टी नेशनल कंपनी में काम करती थीं, उन्हें भी गाँव बुलाकर अपने पूरे परिवार के साथ 25 एकड़ में खेती शुरू कर दी है। इससे पहले कनिका शर्मा ज़ीरो बजट खेती को समझने के लिए देश के भिन्न-भिन्न राज्यों में जाकर प्रशिक्षण लेकर आयी हैं। आज वह अपने गाँव से वापस जुड़ाव पाकर काफी ख़ुश हैं।
Author: Amit Rajpoot
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