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हमारे समाज में महिलाएँ कई तरह की वर्जनाएँ झेलती है, मसलन कि उन्हें कैसे हँसना है, ज़्यादा तेज़ और ख़ुलकर नहीं हँसना है। महिलाओं को चहारदीवारी के भीतर ही घुसे रहना है, उन्हें समाज में ख़ुलकर नहीं रहना है, वैसे जैसे कि मर्द रहते हैं आदि आदि। इन्ही वर्जनाओं में से एक वर्जा ये बी है कि महिलाओं को घर चलाने का काम सामान्यतः नहीं दिया जाता है। यह प्रायः पुरुषों के ही जिम्मे आता है। इस वर्जना को राजस्थान के बाड़मेर ज़िले के रावतसर गाँव की रहने वाली रूमा देवी ने तोड़ डाला है और अपनी हस्तकला की बदौलत न सिर्फ़ उन्होंने ख़ुद को स्वावलंबी बनाया है, बल्कि हज़ारों हज़ार महिलाओं के जीवन को उन्होंने बदलकर रख दिया है।
रूमा देवी के परिवार की स्थितियाँ बहुत बुरी थीं। उन्होंने बचपन से लेकर 17 साल में शादी हो जाने तक कई तरह के कष्ट देखें। लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी और फिर अंत में अपने परिवार की बुरी आर्थिक स्थिति के चलते इन्होंने तय किया कि वह ख़ुद को स्वावलंबी बनाएँगी और अपने परिवार की मदद करेंगी। अपनी घुटन को तोड़कर रूमा देवी ने अपने हुनर को हथियार बनाया। वह हस्तकला की कलंदर थीं और उन्हें सिर्फ़ कपड़े सिलना आता था।
आपको बता दें कि रूमा देवी ने अपने पड़ोस की औरतों को इकट्ठा किया जबकि उन्हें घर से बाहर निकलने की अनुमति उनके घर के मर्द नहीं दे रहे थे। ऐसा 10 औरतों के साथ मिलकर रूमा देवी ने सिलाई कढ़ाई का काम शुरू किया और अच्छे-अच्छे डिज़ाइन के कपड़े बनाकर बाज़ार में स्वयं बेचने लगीं।
धीरे-धीरे कुछ और औरतें रूमा देवी के साथ जुड़कर काम करने लगीं। अब गाँव के मर्द भी रूमा देवी के काम क तवज्जो देने लगे थे, क्योंकि उनके घर की औरतें गाँव में ही कमाकर दिखा रही थीं। दिलचस्प है कि रूमा देवी की हस्तकला से निर्मित कपड़ों को पहनकर अब राजस्थान की महिलाएँ विदेशी फैशन शो में भाग लेकर अपनी छाप भी छोड़ रही हैं।
Author: Amit Rajpoot
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