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तपती गर्मी में सिर फटा जा रहा है। किसी की न कोई बात सुनने का मन कर रहा है और न ही किसी से अपनी कोई बात कहने का। पसीना है कि शरीर को जैसे किसी नदी का ग्लेशियर बना बैठा हो, सूरज उगते ही बहना शुरू हो जाता है और जब तक सूरज वापस क्षितिज में मिल न जाये तब तक या उसके बाद भी बहता ही रहता है। ऐसे में जबकि न एसी काम कर रहा है और न कूलर, पंखा तो मानों उपेक्षा का शिकार हो गया हो बेचारा तो गुरू... एक साहित्य की ही शरण है, जहाँ हम अपनी आत्मा को ठंडक का एहसास करा सकते हैं और गर्मी के मौसम के बिम्बों के साथ कुछ ऐसा गुनगुना सकते हैं कि रूह को सुकून मिल जाये। आइए अवध की कुछ ऐसी ही पंक्तियाँ आपके लिए प्रस्तुत हैं।
तपै जेठ कै गरम महीना।
तर तर तर चुवै पसीना।
एही में नेउता अउर हकारी।
केहु के ब्याह परल ससुरारी।
चार ठो नेउता गांव में बाटै।
ई दुपहरिया दउड़े काटै।
बुद्धू के माई की तेरहीं।
साढ़ू के घर बाटै बरही।
एक अकेले जीव मुरारी।
केकरे केकरे जाँय दुआरी।
रस्ता रस्ता जाम लगत हौ।
बड़ा करारा घाम लगत हौ।।
बब्बू कै तिलकहरू आँएँ।
छेना अउर समोसा खाँएँ।
चाय पकउड़ी पान सुपारी।
फोकट कै चाँपैं बनवारी।।
लेन देन कै बात चलत हौ।
लेकिन सउदा नहीं पटत हौ।
अगुआ उहै खेलावन कक्का।
कहेलन हम देबै दुई चक्का।।
बिटिया इंटर पास बा भाई।
तोहरै कुल के दिया जराई।
लेकिन समधी माँगें कार ।
प्रेम परस्पर सब बेकार।।
समधी ससुरा लालची लगत हौ।
इहाँ न केहु क दाल गलत हौ।
तलाय के बरै जब ठउर ढुँढत हौ,
बड़ा करारा घाम लगत हौ।
आठे बजे से लूह चलत हौ।
तिनका तिनका आग जरत हौ।
एहर पियासल चिरई कउआ।
ओहर फलाने लें दुई पउवा।
मेहरारुन में होय गलचउर।
गुप्ता के घर परल बा सऊर।
एक न लइका अठइँ बिटिया।
खड़ी भइल गुप्ता के खटिया।
मड़ई में खूब तास होत बा।
बात बात पर हास होत बा।
मुँह झुराय भइल बा करिया।
जख लगत बा अब दुपहरिया।
तीन दू पाँच के हाथ खींच में,
गुस्सा बरै जब एही बीच मे।
मेहरारुन कै काम लगत हौ।
बड़ा करारा घाम लगत हौ।।
Author: Amit Rajpoot
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