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ज़िन्दगी जब बोझ सी लगती है, तो कुछ लोग उसे हार जाते हैं और अपना जीवन खो बैठते हैं, लेकिन जब हम जीवन पर सवार हो जाते हैं, हर मुश्किलें आसान हो जाती हैं और हम हर जगह एक विजेता से जीते हैं, जिसके सिर पर ख़ुशियों का ताज होता है और चेहरे पर जीवंतता की आभा। ऐसी ही आभा पाने वाले हैं लखनऊ के रहने वाले स्वप्निल तिवारी। जी हाँ, आपको बता दे कि स्वप्निल तिवारी बचपन से ही डिस्लेक्सिया से पीड़ित रहे हैं और इसके चलते इन्होंने अपने जीवन में कई तरह के उतार-चढ़ाव देखे हैं। इन्ही में से सबसे बरा था महज 12 वर्ष की अवस्था में इनके पिता का गुजर जाना, जिसके बाद इनको जीवन भारी लगने लगा।
लेकिन कहते है कि जब हौसला बुलंद हो तो फिर कोई भी कमी कमी नहीं खवती है, हालांकि स्वप्निल तिवारी को स्कूल के दिनों में उनके सहपाठी पागल कहते थे और न जाने किन-किन तरहों से उन्हें मोलेस्ट करते थे। इसके चलते स्वप्निल तिवारी ने आत्महत्या के प्रयास भी किये, लेकिन होनी को तो कुछ और ही मंजूर था। फिर जह स्वप्निल तिवारी ने नया जीवन देखा तो इनकी जीवन के प्रति ललक जगी और फिर इन्होंने लुप्तप्राय कारीगरों की कला को बचाने के लिए उन्हें संजोने का काम करना शुरू किया।
इस क्रम में इन्होंने देशभर के शिल्पकारों से संपर्क किया और फिर नेकेड कलर्स के नाम से एक पहल शुरू कर दी, जिसका उद्देश्य कारीगरों द्वारा बनाई गयी कला और शिल्प को कॉरपोरेट गिफ़्टिंग मार्केट से जोड़कर आर्थिक लाभ था। स्वप्निल तिवारी का बिजनेस मॉडल इतना अच्छा था कि कुल मुनाफ़े का एक तिहाई हिस्सा शिल्पकारों को मिल जाता था। बाक़ी का एक तिहाई पैसा कंपनी के लिए रखकर शेष धनराशि को अनाथों में वितरित कर दिया जाता है। दिलचस्प है कि स्वप्निल तिवारी महिलाओं की सुरक्षा के लिए तथा एड्स की जागरुकता के लिए भी काम करते हैं।
Author: Amit Rajpoot
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