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एक नगर में बुद्ध प्रवचन दे रहे थे और वह दुःख व मोह पर बात कर रहे थे। बुद्ध ने कहा कि मनुष्य का सबसे बड़ा कष्ट और दुःख का कारण है स्वयं को दूसरों से बाँधना। जहाँ भी मोह होगा या बंधन होगा वहाँ स्वयं ही दुख पैदा हो जाता है। बुद्ध ने प्रवचन समाप्त किया और अपने आश्रम लौट गये। अगले दिन एक व्यक्ति उनके आश्रम में पहुँचा और बोला कि हे बुद्ध! मैंने कल आपका प्रवचन सुना और ऐसा लगा कि जैसे आपने मेरे लिए ही वह प्रवचन देकर आये हैं। मेरे जीवन में अपार दुःख है। इसलिए मैंने सबकुछ छोड़कर आपकी शरण में आने का फैसला किया है।
बुद्ध मुस्कुराए और बोले, तुम क्या-क्या छोड़कर मेरे आप आये हो, कौन-कौन से बंधन छोड़कर आये हो? वह व्यक्ति बोला मेरी पत्नी बहुत बीमार है, उसकी कराह सुनकर मैं दुःख से भ गया हूँ। मेरे माता-पिता भी कष्ट भोग रहे हैं और बच्चा भी मूढ़ है। इसलिए मैंने इन सभी को छोड़कर आपके पास आने का फैसला किया। मैंने सारे बंधन छोड़ दिये हैं और दुनिया को छोड़कर आपके पास आ गया हूँ। बुद्ध ने उसे कहा कि यदि तुमने सारे बंधन छोड़ दिये हैं तो पूर्व की ओर जाओ वहाँ आपको एक ज्ञानी स्त्री मिलेगी, जो तुम्हें कुछ देगी उसे लेकर आना है, क्योंकि उसके पास एक अत्यन्त उपयोगी और आवश्यक वस्तु है।
वह व्यक्ति बुद्ध की बात मानकर पूर्व दिशा की ओर चल दिया। काफी दूर तक चलने के बाद से वह स्त्री मिली, जिसके पास बुद्ध ने उसे भेजा था। वास्तव में वह स्त्री अत्यन्त सुन्दर और आकर्षक थी, जिसे देखकर वह व्यक्ति एकदम से मुग्ध हो गया। वह स्त्री को एकटक देखने लगा, ऐसे में स्त्री से कहा कि क्या तुम्हें मेरी कामना हो रही है? व्यक्ति स्त्री की बात सुनकर चकित हो गया कि आख़िर इसे मेरे मन की बात कैसे पता चली।
उस स्त्री ने बताया कि मुझे बुद्ध ने कहा था कि तुम हर तरह के बंधनों से मुक्त हो, फिर भी तुम्हें मेरी आसक्ति हो रही है। स्त्री की बात सुनकर वह व्यक्ति लज्जित हुआ। अब उसे ज्ञान हो गया था कि मेरे दुःख का कारम मेरी इच्छा ही है, जो एक समाप्त होने के बाद दूसरी पनप जाती है।
Author: Amit Rajpoot
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