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कर्नाटक में बंगलुरु के रहने वाले किशोर राव की माँ कैंसर से पीड़ित थीं, जिनकी कुछ समय बाद मौत हो गयी। अपनी मौत के बाद ज़्यादातर लोग संवेदनाओं और दुःख की गहरी खायी में जा गिरते हैं, लेकिन किशोर राव एकदम सचेत रहे। अपनी माँ के जाने के बाद उन्होंने तय किया कि वह कैंसर के मरीजों के जीवन में शांति घोलने का काम करेंगे और उनका सहारा बनेंगे। इसी क्रम में वह सबसे पहले तो कैंप लगाकर लोगों को कैंसर के लक्षणों के प्रति लोगों को सचेत करने लगे ताकि वह कैंसर की अंतिम स्टेज तक न पहुँचें। लेकिन इस काम के अलावा उन्हें गंभीर रूप से कैंसर से जूझ रहे लोगों की भी मदद करनी थी, जबकि उनकी नौकरी इस काम में बाधक बन रही थी।
किशोर राव ने अपनी नौकरी छोड़ दी और अब वह कैंसर की अंतिम अवस्था से गुजर रहे लोगों के लिए काम करने लगे। उन्होंने बंगलुरु में ही हॉस्पिस ट्र्स्ट बनाया और ऐसे लोगों को इससे जोड़ने लगे जो कैंसर पीड़ितों की मदद में अपना सहयोग दे सकते थे। दिलचस्प है कि किशोर राव क एक टीम बन गयी, जो अंतिम स्टेज के कैंसर को झेल रहे रोगियों को उनके घर जाकर ही ट्रीट करती है। इसमें वह एक काउंसलर के साथ नर्सों की एक टीम को ऑटो रिक्शा से मरीज के गर रवाना करते हैं।
आपको बता दें कि किशोर राव का यह सिलसिला इस क़दर रंग लाया कि उन्होंने अपने इस ट्रस्ट के माध्यम से अब तक 23,000 कैंसर के मीरीजों की मदद कर चुके हैं। यह भी जानना रोचक होगा कि किशोर राव इन कैंसर मरीजों को जो भी सेवाएँ देते हैं, वह पूरी तरह से मुफ़्त में होती हैं मसलन वह चाहे मरीजों के लिए बेड की व्यवस्था हो, उनकी दवाइयाँ हों, परामर्श हो या फिर उनके लिए भोजन ही क्यों न हो। वास्तव में किशोर राव अपने इस काम से आज कैंसर पीड़ितों के दुःखहारण बन चुके हैं, जिनसे हम सब को ऐसा ही कुछ करने की प्रेरणा लेनी चाहिए।
Author: Amit Rajpoot
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