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बुद्ध कहते हैं कि जैसा हम सोचते हैं, हम वैसा ही बनते हैं। हमारी सोच ही हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं। यानी कि हम जैसा विचार करते हैं, वैसे ही बन जाते हैं। लेकिन ये सोच क्या है और कहाँ आती है ये सोच? क्या कभी आपने इसके बारे में सोचा है कि आप अपनी सोच का निर्माण करते हैं या आपकी सोच आपका निर्माण करती है? वास्तव में हम सब जीवनभर सोचने का काम करते हैं और यही वह काम है जिसे हम बिना सोच समझकर करते हैं। फर्ज कीजिए कि क्या आप कबी सोचकर सोचने का काम करते हैं?
नहीं, सोच सदैव चलती रहती है। कई बार तो ये पता भी नहीं चलता है कि आप कुछ सोच भी रहे हैं। अगर आप सही ढंग से सोचेंगे तो आपको इस समय चल रही अपनी सोच का अंतिम छोर भर पता चल पाएगा, आप इस बात का अंदाज़ा नहीं लगा सकते हैं कि आपने सोचना कब शुरू कर दिया था। लेकिन क्या सोचने से हमें वो सबकुछ मिल सकता है जो हम पाना चाहते हैं? क्या हम जो भी पाना चाहते हैं वह केवल सोचकर प्राप्त कर सकते हैं। इन्हीं बातों का उत्तर जानना आवश्यक है।
आपको बता दें कि हम जीवन में जैसा बनते हैं वह हमारी सोच पर ही निर्भर करता है यानी कि जैसा हम सोचते हैं वैसा ही बनते हैं। यह दुनिया सुखी रहे इसके लिए हर जगह सुख ही सुख होना चाहिए। इसके लिए वास्तव में यह सब आवश्यक नहीं है, बल्कि हम यदि हरेक व्यक्ति ख़ुद में कम से कम संसाधन में सुख का अनुभव कर लें तो हम सब सुखी हो जाएंगे।
इसमें ध्यान देने वाली बात है कि हम कम संसाधन में भी सुखी है, जबकि अक्सर अधिक संसाधनों के बाद भी हम सुखी नहीं हो पाते। इस बात का सार यह है कि सबकुछ विचार ही है। हम जैसा विचार करते हैं, वैसे ही बनते हैं। इसमें संसाधन नहीं विचार मायने रखते हैं।
Author: Amit Rajpoot
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