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माही भजनी भोपाल की रहने वाली हैं। सड़क किनारे भीक माँगने वाल बच्चे और कूड़े के ढेर से कबाड़ बीनने वाले बच्चों को देखकर माही भजनी को बचपन से ही संवेदना थी। उनकी मानें तो जब वह बचपन में स्कूल जाया करती थीं और उन्हें छोड़ने उनकी माँ जाती थीं तो वह अपनी माँ से इन भीख माँगने वाले बच्चों के बारे में पूछा करती थीं कि आख़िर ये बच्चे माही भजनी की तरह स्कूल क्यों नहीं जाते हैं। इस सवाल का जवाब माही भजनी को उनके बचपन में उन्हें संतुष्ट नहीं कर सका। ये बड़ी हुयीं और पत्रकारिता की पढ़ाई की। इसके बाद माही भजनी न भोपाल के स्थानीय मीडिया संस्थानों में नौकरी भी की और फिर इनकी शादी हो गयी।
शादी के बाद माही भजनी को बच्चा हुआ और वो बड़ा होकर स्कूल जाने लगा। ये एक संयोग ही था कि माही भजनी का ससुराल वाला घर जहाँ पर था उसके सामने थोड़ी दूरी पर एक ख़ाली ज़मीन थी, जहाँ पर कुछ विस्थापित परिवारों ने अपना डेरा डाला था। यहाँ इन परिवारों के बच्चों को देखकर माही भजनी का मन एक बार फिर डोल गया। उनके बच्चे कूड़ा बीनते थे और भिक्षावृत्ति में सने थे। इस बार चूँकि माही भजनी अब बच्ची नहीं रहीं। इसलिए इनमें कुछ कर पाने की हिम्मत जमा हो गयी और फिर इन्होंने तय किया कि वह ग़रीब बच्चों को शिक्षा देने का प्रबंध करेंगी ताकि ये बच्चे भी समाज की मुख्य धारा से जुड़ सकें।
माही भजनी ने शुरुआत में इन बच्चों को ख़ुद से पढ़ाना शुरू कर दिया और फिर बाद में अनुनय एजूकेशन एवं वेलफ़ेयर सोसायटी का गठन कर और भी बच्चों के लिए इससे जुड़ने का द्वार खोल दिया। वास्तव में माही भजनी के लिए ये सब करना कठिन नहीं था। पहले तो स्वयं इन बच्चों के माता-पिता ही शिक्षा को तवज्जो नहीं देते थे, वे कमाई पर ही ज़ोर देते थे। इसके बाद संसाधनों की कमी आदि माही भजनी के उद्देश्य की बाधाएँ थीं। लेकिन माही भजनी ने तनिक भी हार नहीं मानी और आज माही भजनी 500 से ज़्यादा ग़रीब बच्चों को स्कूल की राह दिखा चुकी हैं, जो फर्राटे से अंग्रेज़ी भी बोलते हैं और अन्य को-कल्कुलर एक्टिविटीज़ में भी काफी आगे हैं।
Author: Amit Rajpoot
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