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हमने देखा है कि लोग बचपन में बहुत निश्छल होते हैं, लेकिन वो जैसे-जैसे बड़े होते जाते हैं, उनमें कपट बरता चला जाता है और वह किसी से दोस्ती भी करते हैं तो पहले उसमें अपना फ़ायदा ज़रूर देखते हैं। वे यह विचार करके ही दोस्ती के लिए किसी से हाथ बढ़ाते हैं कि इसमें उसका कितना फ़ायदा होगा और कितना नहीं। हैरानी की बात तो यह है कि अगर किसी का नुकसान हो रहा हो या फिर उन्हें किसी तरह का फ़ायदा नहीं मिल रहा हो तब भी वह दोस्ती नहीं करते हैं। वास्तव में लोग बड़े होते जाने के क्रम में ऐसे ही होते चले जाते हैं। आइए जानते हैं कि इस पर भगवान बुद्ध के क्या विचार हैं।
बुद्ध कहते हैं कि जैसे हमारे विचार होते हैं, वैसे ही हम बनते हैं। सच में देखें तो हम अपने विचारों के अलावा कुछ और हैं ही नहीं। हम आज जो कुछ बी हैं, वह हमारे विचारों का ही संग्रह है। जब हम जन्म लेते हैं तो हमारे दिमाग़ में कोई विचार नहीं होते हैं। लेकिन हो सकता है कि कुछेक विचार बच्चों के मन में आ जायें। मन पूर्णतः ख़ाली होता है और प्रफुल्लित भी होता है। धीरे-धीरे मन का निर्माण होता है और विचारों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती चली जाती है। विचार कितने और कैसे होंगे यह हमारे दिमाग़ पर निर्भर करता है। इसलिए विचारों की प्रबलता का हमें अंदाज़ा लगा लेना चाहिए।
बुद्ध कहते हैं कि कोई व्यक्ति जब बड़ा हो जाता है, जो कि कभी अपने बचपने में बेहद साफ मन का और बिना कपट वाला हुआ करता था, वह अब नफरत वाला मनुष्य हो गया है। उसमें अब प्रेम भी नहीं है या फिर कम हो गया है। अब वह हर किसी से दोस्ती नहीं करता है।
जी हाँ, दोस्ती करते समय वह देखता है कि ये मेरे फ़ायदे के लिए है या नहीं। अगर उसे कोई फ़ायदा नहीं दिखता है तो वह दोस्ती नहीं करता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि व्यक्ति के भीतर विचारों की अधिकता हो जाती है। बड़े होने पर हर कोई छोटे से छोटे मुद्दे पर सोचना शुरू कर देता है, न कि जीवन के प्रति सजग होता है।
Author: Amit Rajpoot
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