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अगर आप अपने लिए डिप्रेशन या अवसाद पैदा कर पा रहे हैं, तो आप अपने भीतर काफी सारी भावनाएँ और विचार पैदा कर पा रहे हैं। लेकिन इन सभी की दिशाएँ ग़लत दिशा में हैं। अगर आपके पास किसी चीज़ के लिए बहुत गहरी भावनाएँ और तीव्र विचार न हों, तो आप डिप्रेशन के शिकार नहीं होंगे। वास्तव में आप ऐसे विचार और भावनाएँ पैदा कर रहे हैं, जो आपके पक्ष में नहीं हैं, बल्कि ये सब आपके ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं। तो आपके पास डिप्रेशन पैदा करने के लिए ज़रूरी शक्ति है, क्योंकि आप किसी भारी शक्ति के साथ ही ऐसा कर पा रहे हैं, जो कि आपके भीतर से ही पैदा होती है।
आपको बता दें कि अगर लोगों के एक समूह को हम किसी ख़ास तरह की भावना और विचार के साथ प्रशिक्षित करें और कुछ बाहरी हालातों से उन पर दबाव भी डालें तो लगभग हर की अपना मानसिक संतुलन खो देगा और वह पूरा समूह क्लीनिकल तौर पर बीमार हो जाएगा। हैरानी न हो ये जानकर कि उन्हें पागलपन के हद तक भी ले जाया जा सकता है। वास्तव में विवेक और पागलपन के बीच बहुत ही बारीक़ सीमारेखा होती है, जिसे लोग हरदम ढकेलते रहते हैं। ग़ुस्सा करना वास्तव में अपने विवेक की सीमा को पाग़लपन की तरफ़ धकेलना ही होता है।
ऐसे में यदि ये क्रिया हमेशा नियमित तौर पर अपनायी जाये तो बहुत संभव है कि किसी दिन ये धक्का इतना तेज़ हो जाए कि विवेक के पाले से निकलकर आप पागलखाने के पाले में चले जायें। फिर आप क्लीनिकल तौर पर भी रोगी हो सकते हैं। इस प्रकार, डिप्रेशन का मूल कारण यह है कि आप किसी चीज़ को ज़रूरत से ज़्यादा सोचते हैं और आवश्यकत से अधिक लोगों पर ग़ुस्सा करते हैं या ग़ुस्सा करने का नाटक करते हैं।
Author: Amit Rajpoot
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