Forgot your password?

Enter the email address for your account and we'll send you a verification to reset your password.

Your email address
Your new password
Cancel
हमारे देश में हर समयकाल में ऐसे बहुत के कवि और विद्वान हुए हैं, जिन्होने सामाजित हित में अपनी बार रखी हैं और इन सबमें संत कबीरदास का स्थान सबसे ऊपर हैं, क्योंकि उनकी रचनाएं हर समय काल के लिए उपयोगी हैं। जी हां, कबीरदास ने अपने समय में जिस तरह से समाज में व्याप्त हिंसा, अंधविश्वास, जातपात, छुआछूत जैसी सामाजिक बुराईयों के खिलाफ आवाज मुखर किया था, उनकी वो रचनाएं और दोहें आज भी समाज के लिए उतने ही प्रासंगिक हैं। आज भी समाज में ऐसी कई कुरीतियां और बुराईयां मौजूद हैं, ऐसे में कबीरदास के दोहे और उनका ज्ञान आज के समय में कहीं अधिक उपयोगी सिद्ध होता है। आज संत कबीरदास के जंयती के मौके पर हम उनके ऐसे ही कुछ अनमोल दोहे लेकर आए हैं।
इस दोहे का शाबम्दिक अर्थ है कि... जब मैं इस संसार में दूसरों में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई उतना बुरा न मिला, जबकि जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मै ही सबसे बुरा हूं। दरअसल, इस दोहे के जरिए कबीर जी कहना चाहते हैं कि दूसरों के अंदर बुराई ढ़ूढ़ने से पहले स्वयं को देखिए, आपको खुद में ऐसी कई बुराईयां नजर आएंगी जो शायद दूसरों में ना हो।
इस दोहे में कबीर जी कहते है कि किसी की महत्तता उसकी जाति से नहीं बल्कि उसके ज्ञान से होनी चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे तलवार की मोल उसके खुद की क्षमता से होती है, ना कि उसके मयान से जिसमें वो रखा होता है।
इस दोहे के जरिए कबीरदास जी कहना चाहते हैं कि प्रयत्न करने से ही सफलता मिलती है जैसे कि समुद्र से मोती उन्ही को मिलते हैं जो उस समुद्र में गोते लगाते हैं, ना कि किनारे पर बैठ कर पानी में उतरने से डरने वालों को।
ये कबीरदास जी का बेहद लोकप्रिय दोहा है, जिसमें उन्होने किसी भी चीज की अति को बुरा बताया है। कबीर जी कहते हैं कि ना तो अधिक बोलना अच्छा होता है और ना ही किसी का अधिक चुप रहना, जैसे कि ना तो अधिक बारिश अच्छी होती है और ना ही अधिक धूप।
इस दोहे में कबीर जी कहना चाहते है कि व्यक्ति को अपने निंदक से दूर नहीं भागना चाहिए, बल्कि उसे तो अपने निंदक के और पास रहने की कोशिश करनी चाहिए। क्योंकि जो आपकी निंदा करता है, वो आपके लिए बुराईयों को बिना साबुन और पानी के ही साफ कर देता है। ऐसे में इस तरह के व्यक्ति से निकटता बनाए रखने में ही भलाई होती है।
इस दोहे के जरिए कबीर जी कहना चाहते हैं को जो लोग वास्तव में सज्जन होते हैं, वो अपनी सज्जनता को कभी नहीं छोड़ते चाहें जीवन में उन्हें कितने भी दुष्ट लोगों का सामना करना पड़े, ठीक वैसे ही जैसे कि चन्दम का वृक्ष अपनी शीतलता नहीं छोड़ता, भले ही उस पर कितने भी सांप लोटते रहते हैं।
इस दोहे के जरिए कबीर जी कहना चाहते हैं कि इस संसार में रहते हुए उनकी सिर्फ इतनी सी इच्छा है सबका भला हो और अगर इस दुनिया में उनका कोई किसी से दोस्ती नहीं तो कोई दुश्मनी भी न हो !
इस दोहे के जरिए कबीर जी कहना चाहते हैं सिर्फ किताबी ज्ञान के जरिए ही कोई ज्ञानी या पंडित नहीं हो जाता है, बल्कि असल ज्ञानी तो वो है जो कि दूसरो से निस्वार्थ प्रेम करता है।
Author: Yashodhara Virodai
YOUR REACTION
  • 0
  • 0
  • 0
  • 0
  • 0
  • 0

Add you Response

  • Please add your comment.