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पानी बेहद अनमोल है, ये बात हममे से हर कोई जानता है, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इस बात की सजगता हममे में शायद बहुत ही कम लोगों में होती है। यही कारण है कि ज़्यादातर लोग पानी के उपयोग को लेकर बेहद लापरवाह होते हैं। वे उन लोगों की समस्या को समझ नहीं सकते जिनके इलाक़ों में पानी के लिए समस्या है या जद्दोजहद है। असल में ये उस स्थिति का अंदाज़ा लगा पाने में भी नाकाम होते हैं, जिसमें यह समझा जा सके कि बिना पानी के फिर क्या? वास्तव में पानी के मोल को समझना बेहद ज़रूरी है और उसका संरक्षण करना भी। इसीलिए शशांक सिंह कछवाहा इसी काम में लग गये हैं।
आपको बता दें कि इसके लिए बिहार के रहने वाले शशांक सिंह ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद साल 2015 हीरो साइकिल में बतौर क्वालिटी मैनेजर की अपनी नौकरी तक छोड़ दी है और भारतीय स्टेट बैंक की यूथ फॉर इंडिया फ़ेलोशिप से जुड़ गये। इस दौरान वह राजस्थान के अजमेर ज़िले के छोटा नारायण गाँव गये। इस गाँव में एक तालाब हुआ करता था, जो अब सूख चुका था और गाँव वालों को व उनके मवेशियों को पानी की भारी दिक्कत थी।
इस समस्या को दूर भगाने के लिए शशांक सिंह कछवाहा ने तक़रीबन सात सौ बीघे के जलक्षेत्र वाले उस सूखे पड़े तालाब पर काम करना शुरू किया। इसके तैयार होने पर आसपास के पाँच गाँव के लोगों के साथ क़रीब 5000 जानवरों के पानी पीने की व्यवस्था हो गयी।
दिलचस्प है कि शशांक सिंह कछवाहा इसके बाद यहाँ रुके नहीं, बल्कि जल संरक्षण के प्रति लोगों को जागरुक करने और ज़मीन पर काम करने को लेकर उन्होंने छोटा नागपुर के पठार में भी जमकर काम किया है। यह भी जानना काफी दिलचस्प है कि शशांक ने जल संरक्षण की जागरुकता के लिए राजस्थान से लेकर कन्याकुमारी, रामेश्वरम और उड़ीसा तक का सफ़र तय किया है।
Author: Amit Rajpoot
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