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भारतरत्न भार्गव किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वह जयपुर के रहने वाले हैं। नाटक व साहित्य इनके पसंदीदा विषय हैं। पढ़ी करने के बाद ये सबसे पहले तो राजस्थान विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर नियुक्त हुये। इसके बाद ये ऑल इंडिया रेडियो के दिल्ली स्टेसन चले आये और रहकर ब्रॉडकास्टिंग से जुड़ गये। आकाशवाणी में काम करने के बाद भारतरत्न भार्गव बीबीसी लंदन चले गये। लंदन से वापस आने पर ये संगीत नाटक अकादमी में अपनी सेवाएँ देने लगे। इसके बाद जब जब ये संगीत नाटक अकादमी से सेवनिवृत्त होकर राजस्थान पहुँचे तो असल में भारतरत्न भार्गव का जन्म हुआ।
जी हाँ, दिल्ली स्थित संगीत नाटक अकादमी में सेवानिवृत्त होकर भारतरत्न भार्गव ने ग़रीब, अनाथ और असहाय बच्चों की मदद करने लगे। जयपुर में रहकर इन्होंने कुछ दिन तो ऐसा किया, पिर देखा कि कुछ बच्चे जान-बूझकर ग़रीब बन रहने का दिखावा कर रहे हैं। इस बात को जानकर भारतरत्न भार्गव ने उनकी मदद करनी बंद कर दी और इनका मन खिन्न हो गया। फिर जयपुर के हीरों का व्यापार करने वाले कोठारी परिवार ने इन्हें दृष्टिबाधिक बच्चों के साथ काम करने का सुझाव दिया। ये बात भारतरत्न भार्गव को जची।
इस क्रम में उन्होंने दृष्टिबाधित बच्चों के साथ सबसे पहले एक नये तरह का प्रयोग किया। उन्होंने बच्चों के साथ मुंशी प्रेमचन्द्र के एक नाटक का प्रयोग किया, जो कि सफ़ल रहा। नाटक ख़त्म होने के तुरन्त बाद ही इन बच्चों ने भारतरत्न भार्गव से कहा कि वह उनके साथ रहना चाहते हैं और साथ में काम करना चाहते हैं।
बस, फिर क्या था इन्हीं बच्चों के साथ भारतरत्न भार्गव ने ‘नाट्यकुलम्’ नामक संस्था का गठन कर डाला और इन बच्चों को ये अभिनय, संगीत, सुर, लय और ताल का ज्ञान देना शुरू कर दिया। उन्हें भारतरत्न भार्गव ने जमकर प्रशिक्षण दिया और कुशल बनाया। इसके बाद से इन दृष्टिबाधित बच्चों में जीवन के जो रंग घुले हैं वो इनको भलीभांति देख पा रहे हैं और जीवन को एक नए नज़रिए से देख भी पा रहे हैं। वास्तव में भारतरत्न भार्गव का प्रयास प्रेरणादायी है।
Author: Amit Rajpoot
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