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महर्षि पतंजलि मूलतः योगसूत्रों के रचनाकार थे। उन्होंने योगसूत्रों का प्रतिपादन किया और इसकी प्रासंगिकता ऐसी बनी कि आज पूरी दुनिया योगमय है। इसीलिए बीते पाँच वर्षों से हर साल 21 जून को पूरी दुनिया योग दिवस मनाती है। ऐसे में इस दिन योगसूत्रों के जनक महर्षि पतंजलि की प्रासंगिकता बढ़ जाती है। आपको बता दें कि महर्षि पतंजलि योग ने और व्याकरण के अलावा चिकित्सा शास्त्र का भी अध्ययन किया था। इसके बाद वह आयुर्वेद के मर्मज्ञ बनें। ग़ौरतलब है कि महाभाष्य व्याकरण का ग्रंथ होने के साथ-साथ तत्कालीन समाज का विश्वकोष भी उन्हीं की बदौलत है। दिलचस्प है कि इस महत्वपूर्ण भूमिका के लिए महर्षि पतंजलि को शेषनाग का अवतार कहा जाता है।
योग, व्याकरण और चिकित्सा में अधिकार होने के कारण उनकी विद्वता की सभी क्षेत्रों में मान्यता थी। आपको बता दें कि द्रविड़ के प्रतिष्ठित कवि रामचन्द्र दीक्षित ने ‘पतंजलि चरित’ नामक काव्य में कतिपय नये तथ्य और संबावनाएँ बताने का काम किया है। इस कवि के अनुसार आदि शंकराचार्य के दादागुरु आचार्य गौड़पाद महर्षि पतंजलि के शिष्य थे। उन्होंने बताया कि महर्षि पतंजलि का निवास कश्मीर में गोनार्द नामक गाँव या फिर उत्तर प्रदेश के ज़िला गोंडा में माना जाता है।
यह भी जानना दिलचस्प है कि महर्षि पतंजलि की माँ का नाम गोणिका था और पिता का नाम लोगों को ज्ञात नहीं है। महर्षि पाणिनि के क़रीब दो शताब्दी बाद महर्षि कात्यायन ने उनके व्याकण पर 1200 सूत्रों के वार्तिक लिखे। यही सबसे पुरानी टीका मानी जाती है।
आपको बता दें कि 600 साल बाद महर्षि पतंजलि ने पाणिनि के सूत्रों पर विशद भाष्य लिखा जो कि ‘व्याकरण महाभाष्य’ के नाम से विख्यात है। दुनियाभर के भारतीय और पश्चिमी विद्वान महर्षि पतंजलि का कालखण्ड यही मानते हैं। इस प्रकार देखा जाये तो ‘व्याकरण महाभाष्य’ का काल 140 से 120 ई. पू. जाकर ठहरता है। हालांकि बावजूद इसके तमाम विद्वान अभी भी पतंजलि के जन्म और कालखंड को लेकर एकमत नहीं है।
Author: Amit Rajpoot
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