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शिक्षा से जीवन के द्वार ख़ुलते हैं। जी हाँ, ज़िन्दगी पाना भर एक अहम बात नहीं है, इसकी उपलब्धि है जीवन को प्राप्त कर लेना और इसके द्वार शिक्षा से ही ख़ुलते हैं। ऐसे में हरेक के लिए शिक्षा एक महत्वपूर्ण उपकरण है, जिससे जीवन को महसूस करने वाला दरवाज़ा ख़ुलता है। लेकिन चिंता की बात यह है कि आज 21वीं सदी में भी हमारे देश में शिक्षा का प्रतिशत महज 74.04 है, जो कि विश्व की साक्षरता दर 84% से लगभग 10 फीसदी कम है।
इसलिए किसी न किसी तरह से हर किसी को शिक्षित करने का धर्म सबसे बड़ा धर्म माना गया है। चूँकि सबके पास शिक्षा का सामर्थ्य नहीं है और न ही ऐसा माहौल है, तो कुछ लोग इस धर्म को अपनाकर और तमाम चुनौतियों को पार करके असहाय और ज़रूरतमंद बच्चों को पढ़ाने का काम करते हैं। इन्हीं चंद लोगों में से एक हैं छत्तीसगढ़ के रायपुर की रहने वाली अंकिता जैन।
आपको बता दें कि अंकिता जैन पत्रकारिता की छात्रा रही हैं, इसीलिए उनमें हमेशा से ही कुछ अलग कर जाने की चाहत रही है। लोगों से बात करना उनकी आदत में हैं। समाज में जो भी उपेक्षित हैं उनकी सुध लेना अंकिता जैन को आता है। ऐसे में एक दिन आदर्श नगर की बस्ती से अंकिता जैन ग़ुजर रही थीं वहाँ उन्हें कुछ बच्चे दिखाई दिये जो हमेशा इधर-धर घूमा करते थे और अपने जीवन की राह से भटके हुए थे। अंकिता ने उनमें से एक से पूछा कि आप बड़े होकर क्या बनना चाहते हो, तो बच्चे का जवाब शून्य था।
ये शून्यता ज़्यादा देर तक टिकी नहीं, बच्चे ने अंकिता से सवाल के बदले सवाल दागा कि क्या आप हमें पढ़ा सकती हैं.. क्या आप हमें सपने देखने के क़ाबिल बना सकती है? वास्तव में अंकिता के लिए यह एक साधारण घटना नहीं थी। वो घर जाकर उस बच्चे की बात को सोचती रहीं और फिर एकदम से तय कर लिया कि वो इन बच्चों को पढ़ाने का काम करेंगी।
फिर क्या था अंकिता जैन ने उन बच्चों से बात की और उन्हें पढ़ाई व उनके व्यक्तित्व विकास से संबंधित हर तरह की बातें बताने लगीं, उन्हें शिक्षित करने लगीं। अंकिता का प्रयास आज भी नियमित तौर पर जारी है।
Author: Amit Rajpoot
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