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लू एक तरह की तेज़ और गर्म हवाएँ हैं, जो वास्तव में मानसून के आने से पहले वर्षा के मैदान में फर्राटे मारती हैं। यूँ समझिए कि उत्तरी भारत में गर्मी के दिनों में उत्तर-पूर्व तथा पश्चिम से पूरब दिशा में चलने वाली प्रचण्ड उष्ण तथा शुष्क हवाओं को लू कहतें हैं। लू के समय तापमान 45 डिग्री सेंटिग्रेड से तक जा सकता है। गर्मियों के इस मौसम में लू चलना आम बात है। लू लगना गर्मी के मौसम की बीमारी है। लू लगने का प्रमुख कारण शरीर में नमक और पानी की कमी होना है। पसीने की शक्ल में नमक और पानी का बड़ा हिस्सा शरीर से निकलकर खून की गर्मी को बढ़ा देता है।
जब किसी इंसान को लू लगती है तो उसके सिर में भारीपन मालूम होने लगता है, नाड़ी की गति बढ़ने लगती है, खून की गति भी तेज हो जाती है। साँस की गति भी ठीक नहीं रहती तथा शरीर में ऐंठन-सी लगती है। बुखार काफी बढ़ जाता है। हाथ और पैरों के तलुओं में जलन-सी होती रहती है। आँखें भी जलती हैं। इससे अचानक बेहोशी व अंततः रोगी की मौत भी हो सकती है।
आपको बता दें कि गर्मी के दिनों में होने वाले इस भारी प्रॉब्लम से निपटने के लिए लगातार थोड़ा-थोड़ा पानी पीते रहना चाहिए और हमारे शरीर का सामान्य तापमान 36-37 डिग्री के बीच में कैसे संतुलित रहे, इस ओर ध्यान देने रहना चाहिए।
एक बात और जो सबसे अधिक ध्यान देने वाली है कि ज़्यादातर लोगों का ये मानना है कि लू का प्रभाव दोपहर को सर्वाधिक होता है और ये तभी नुकसान करती है।
आपको बता दें कि ये बात नहीं है, क्योंकि लू का प्रभाव शाम को होता है, यानी कि आपको दोपहर की गर्म हवा अदिक परेशान भले कर दे लेकिन शाम को चलने वाली लू ही आपकी मौत का कारण बनेगी, इसलिए शाम के वक़्त हवाओं से बचना अधिक ज़रूरी है।
Author: Amit Rajpoot
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