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जिम में प्राण ऊर्जा का ह्रास होता है, योग में प्राण ऊर्जा का संचय होता है। जिम में बाह्य शरीर सुडौल और मनचाहा आकर लेता है। योग से बाह्य शरीर के साथ साथ मन भी मन मनचाहा आकार लेता है और सन्तुलित होता है। जिम केवल शरीर पर नियंत्रण देता है, योग शरीर के साथ साथ मन को भी नियंत्रित करता है और आत्मा को भी बल प्रदान करता है। जिम फैट को गलाता है, पसीने में बहाता है, योग फैट को तेजस, ओजस, वर्चस में बदलकर प्राण ऊर्जा को बढ़ा देता है। जिम करने के बाद व्यक्ति थका हुआ महसूस करता है, योग करने के बाद व्यक्ति तरोताज़ा और शांत महसूस करता है।
जिम मष्तिष्क का व्यायाम नहीं करता, योग मष्तिष्क का व्यायाम करता है। योग बुद्धिकुशलता और एकाग्रता बढ़ाता है, जो युवाओं के लक्ष्य प्राप्ति, कैरियर बिल्डिंग और जॉब में प्रमोशन में मददगार है। जिम से रोग ठीक नहीं कर सकते, लेकिन योग से न सिर्फ़ रोग ठीक कर सकते हैं, अपितु रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ा सकते है। अतः जिम से योग सर्वश्रेष्ठ है।
आपने महसूस किया होगा, यदि पेट ख़राब हो तो मन स्वतः ख़राब हो जाता है, कुछ भी कार्य करने में मन नहीं लगता। यदि मन खराब हो तो पेट खराब हो जाता है खाया हुआ अन्न ठीक से पचता नहीं, शरीर में बल बढ़ता नहीं।
योग इस नियम को अच्छी तरह समझता है कि दुनिया के समस्त रोगों की जड़ पेट और मन मे होती है। यदि इन दोनों को स्वस्थ एवं व्यवस्थित बना लिया जाये तो ताउम्र निरोगी रहा जा सकता है। योग पेट और मन दोनों के बीच सन्तुलन और स्वास्थ्य संवर्धन करता है।
योग के माध्यम से प्राणशक्ति और स्वास्थ्य अर्जित किया जाता है। योगमय जीवन जीने से, लोकसेवा की भावना और कार्य से जीवन मे सदा उत्साह उमंग अनवरत बना रहता है।
जवान मन की तरह सुकोमल, नए उत्साहित विचारों से मन भरा रहता है। चेतना ईश्वर से जुड़ी रहती है और ऐसे व्यक्ति को चिर यौवन और शाश्वत सौंदर्य प्राप्त होता है।
Author: Amit Rajpoot
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