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हमारे देश में साल 2014 में ‘नाल्सा जजमेंट’ लागू होने से पहले किसी भी सरकारी या ग़ौर सरकारी संस्थान में जब भी कोई फॉर्म भरा जाता था, तो उसमें महिला या पुरुष के कॉलम ही हुआ करते थे, जो कि यह स्पष्ट तौर पर दर्शाता था कि इसमें ग़ैर-महिला और ग़ौर-पुरुषों के लिए कोई जगह नहीं है जबकि कोई महिला या पुरुष में से कुछ भी न हो। वास्तव में यह एक बड़ी विडंबना थी, जो भले ही जानबूझकर न की गयी हो, लेकिन हमारे समाज में मौजूद ऐसे अनेक सेक्शुअल चैलेन्ज्ड लोगों को यह शिक्षा और रोजगार से वंचित कर रहा था, इसी दुराग्रह और पूर्वाग्रह को तोड़ने की अगुवाई की है ट्रांसजेंडर धनंजय चौहान ने।
जी हाँ, धनंजय चौहान पंजाब विश्वविद्यालय से परास्नातक करने वाले पहले ट्रांसजेंडर हैं। इन्होंने अपनी लड़ाई में शिक्षा को ही शिक्षा के लिए हथियार बनाया है। हालांकि धनंजय चौहान के स्कूल और कॉलेज में इनके सहपाठी इनकी सेक्शुअलिटी को लेकर हमेशा मज़ाक बनाते थे, जिसके चलते तनाव जब बर्दाश्त के बाहर चला गया तो इन्होंने संस्थागत पढ़ाई छोड़ दी। लेकिन इनमें पढ़ने की ललक थी, लिहाजा धनंजय चौहान ने रूसी और फ़्रेंच भाषाओं क साथ कंप्यूटर साइंस में डिप्लोमा किया। इसके बाद इन्होंने इग्नू सामाजिक कार्य विषय में परास्नातक भी किया।
पढ़ाई के बाद जब धनंजय चौहान ने नौकरी करनी शुरू की तो वहाँ भी इनके साथ कॉलेज के दिनों जैसा व्यवहार होने लगा। ऐसे में धनंजय चौहान ने नौकरी को भी अलविदा कह दिया और ख़ुद को कमरे में क़ैद कर लिया। लेकिन अब भी ये क़िताबों के साथ जुड़े रहे और यहीं से इन्होंने तय किया कि अब तो अपने लिए ख़ुद ही आवाज़ उठानी पड़ेगी।
इस प्रक्रिया में इन्होंने ख़ूब संघर्ष किया और नित संघर्ष को ऊँचाइयाँ देते रहे। इसी क्रम में साल 2014 में ‘नाल्सा जजमेंट’ लागू करवाने में इन्होंने अग्रमी भूमिका निभाई और तब जाकर इनको विजय मिली। यक़ीनन आज ट्रांसजेंडर्स की हालात पहले से कहीं बेहतर है। इसमें धनंजय चौहान के यौगदान को भूलाया नहीं जा सकता।
Author: Amit Rajpoot
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