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ये बातें ज़्यादातर लोगों के मन में बचपन से बैठी रहती है कि आख़िर भगवान कौन हैं। हममे से हर कोई अपने जीवन में कभी न कभी इस प्रश्न के साथ जद्दोजहद ज़रूर की है। जी हाँ, लोगों के लिए आत्मा पवित्र है, लेकिन शरीर उन्हें अपवित्र लगता है। ऐसे ही लोगों को स्वर पवित्र लगता है, लेकिन उसकी बनाई हुयी सृष्टि लोगों को अपवित्र मालूम पड़ती है। वास्तव में ईस्वर का विचार ही आपके मन में तब आया जब आपने सृष्टि को देखा। सृष्टि को देखकर ही आप उसके सृष्टा या ईश्वर के बारे में विचार करने लगते हैं।
अब सवाल ये है कि आख़िर भगवान कौन हैं और वो कैसा दिखता है, इस बात का जवाब बड़ा ही स्पष्ट है कि पश्चिम में गोरे लोगों ने अपने भगवान की जो कल्पना की है वो गोरे रंग के भगवान की है। ऐसे ही युगांडा के ईदी अमीन ने ऐलान किया था कि भगवान का रंग काला है। यक़ीनन यह वैसा ही है जैसे गोरों के भगवान गोरे हैं और भारत के लोगों के भगवान साँवले हैं। ऐसे में ये स्पष्ट है कि हर को अपने भगवान की संकल्पना अपनी सुविधा के हिसाब से करता है।
आपको बता दें कि भगवान के बारे में जो आपका विचार है वह केवल ख़ुद का बढ़ा-चढ़ाकर बनाया गया संस्करण है। अभी तकमनुष्य ख़ुद को ही पूरी तरह से परिभाषित नहीं कर सकता है। ऐसे में मनुष्य अपने स्रोत को ही कैसे परिभाषित कर सकता है भला। इसे तो वास्तव में सिर्फ़ और सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है और अनुभव किया जा सकता है, जो भगवान में विलीन होकर ही मार्ग देगा।
Author: Amit Rajpoot
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