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डॉ. रविन्द्र कोल्हे महात्मा गाँधी और विनोबा भावे के विचारों से अत्यधिक प्रेरित हैं। इन्होंने नागपुर में जब ये एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे थे, तभी अपने छात्र जीवन के समय से ही यह विचार बनाया था कि ये अपने हुनर का इस्तेमाल आने वाले भविष्य में पैसा कमाने के लिए नहीं, बल्कि ज़रूरतमंदों के लिए करेंगे। लेकिन इसकी शुरुआत कहाँ से की जाये ये बात डॉ. रविन्द्र कोल्हे को नहीं समझ में आ रही थी। ऐसे में पेशे से डॉक्टर हो चुके रविन्द्र कोल्हे ने तय किया कि ये अपनी सेवाएँ ऐसी दूरस्थ जगह देंगे जहाँ स्वास्त्य सेवाएँ अभी तक पहुँची ही नहीं हैं।
डॉ. रविन्द्र कोल्हे ने एमडी की और अपनी थीसिस मेलघाट में व्याप्त कुपोषण पर की। थीसिस कंप्लीट करने के बाद डॉ. रविन्द्र कोल्हे ने मेलघाट वापस लौटने का निर्णय किया और तमाम शोधकर्ताओं की रिसर्च के आगे इन्होंने कुपोषण का जो कारण ढूढञ निकाला वो हैरान करने वाला था। वास्तव में यहाँ के लोगों की मौत का कारण ग़रीबी थी।
जी हाँ, जाड़े में यहाँ के लोगों के पास तन ढकने के लिए कपड़े नहीं होते थए। वे कुपोषम से मरते थे, क्योंकि उनके पास कोई काम नहीं था और जब खेती का मौसम नहीं होता था तब उनके पास पैसे भी नहीं होते थे। डॉ. रविन्द्र कोल्हे ने इन गाँव वालों का रख-रखाव करना शुरू किया तो इनकी हालत सुधरने लगी।
मेलघाट के लोगों का डॉ. रविन्द्र कोल्हे पर ऐसा विश्वास जा बना कि ये लोग अपने पशुओं का लाज कराने भी इन्हीं के पास आआने लगे। ऐसे में डॉ. रविन्द्र कोल्हे ने अपने एक पशु चिकित्सक मित्र से जानवरों की शारीरिक संरचना की पढ़ाई की। इतना ही नहीं यहाँ के लोगों को उन्नत कृषि समझाने के लिए डॉ. रविन्द्र कोल्हे ने पंजाब राव कृषि विद्यापीठ, अकोला से कृषि की पढ़ाई भी की। काफी मेहनत के बाद डॉ. रविन्द्र कोल्हे ने एक ऐसा बीज विकसित कर दिया, जिसमें फंगस नहीं लगते हैं।
इस बीज ने मेलघाट के लोगों की तक़दीर बदल दी। अब यहाँ का कोई भी किसान आत्महत्या नहीं करता है। वास्तव में डॉ. रविन्द्र कोल्हे क प्रयासों से मेलघाट के लोगों को स्वास्थ्य और कृषिक्षेत्र में परिवर्तन पाकर नया जीवन मिला है।
Author: Amit Rajpoot
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