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ज़्यादातर अभिभावक अपने बच्चों की सफ़लता या असफ़लता की तुलना पड़ोसियों या रिश्तेदारों के बच्चों से करते हैं। लेकिन ये किसी भी बच्चे के विकास में आने वाले अनेक अवरोधों में से एक बड़ा अवरोध है। इसलिए कभी भी बच्चे की पढ़ाई या उसके करिअर की किसी से भी तुलना नहीं करनी चाहिए। हालाँकि इस बात से बिल्कुल भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि अब बच्चों की शैक्षणिक और पेशेगत सफ़लता सामाजिक प्रतिष्ठा के साथ जुड़ गयी है। ज़्यादातर माता-पिता आज अपने बच्चे की सफ़लता को रिश्तेदारों और पड़ोसियों के बच्चों की सफ़लताओं के साथ तौलने की भूल करते रहते हैं।
इसका एक सबसे बड़ा कारण डॉ. निमेष जी देसाई बताते हैं कि ऐसा करने वाले ज़्यादातर अभिभावक अपने अधूरे ख़्वाब अपने बच्चों के ज़रिए पूरा करने की कोशिश करते हैं या फिर उसके फ़िराक़ में जाने-अनजाने भी ऐसा कर जाते हैं। आपको बता दें कि सफडलता के पैमाने पर नम्बरगेम से जोड़ना भी बच्चों में कई तरह की मानसिक बीमारियों को पैदा कर देता है और यह सिलसिला सिर्फ़ बच्चों के साथ ही नहीं है, बल्कि ऐसा उम्र में बड़े लोगों के साथ भी होता है।
आपको बता दें कि हर अभिभावक को चाहिए कि वे अपने बच्चों की अभिरुचि का सम्मान करें और उन्हें क्रमिक रूप से आगे बढ़ने के अवसर उपलब्ध कराएँ। बच्चे की किसी भी सफ़लता को उसके नम्बरों से कतई न आँकें। हर बच्चा अपनी ख़ूबी के साथ काफ़ी अच्छा होता है, इसलिए आपसे हो सके तो उसके विचारों का सम्मान करते हुए उसके विचारों के अनुकूल उसको सपोर्ट करने की कोशिश करें।
Author: Amit Rajpoot
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