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कलिंग शैली में भारत के पूर्वी तटीय राज्य ओडीशा के उत्तर-पूर्वी किनारे पर समुद्र तट से थोड़ी दूरी में ही सूर्य के रथ के रूप में एक मन्दिर निर्मित है, जिसे हम सूर्य मन्दिर के नाम से भी जानते हैं। इनमें पूरे रथ को 12 जोड़ी चक्रों वाले सात घोड़े खींचते हैं। आपको बता दें कि इस मन्दिर को देश और दुनिया में कोणार्क के सूर्य मन्दिर के नाम से जाना जाता है। इस मन्दिर के बारे में ऐसा मान्यता विकसित है कि आज बी यहाँ नर्तकियों की आत्माएँ आती हैं और शाम के वक़्त नके पायलों की झंकार सुनाई देती है। कहते हैं कि वे कभी यहाँ मन्दिर के परिसर में नृत्य किया करती थीं।
कोणार्क के सूर्य मन्दिर की जो सबसे आश्चर्य जनक बात है वह यह है कि इस मन्दिर के भीतर कभी किसी की पूजा नहीं हुयी है। किंवदंतियों के अनुसार इसे लोग कुँआरा मन्दिर भी कहते हैं, जिसके पीछे का कारण शायद किसी को नहीं मालूम। कोणार्क के सूर्य मन्दिर के सन्दर्भ में लोगों का यह भी कहना है कि यह मन्दिर पहले एकदम समुद्र किनारे ही हुआ करता था। लेकिन बाद में समुद्र धीरे-धीरे कम होता गया और ऐसे में मन्दिर थोड़ा दूर होता गया। यह बात भी जानने लायक है कि कोणार्क के सूर्य मन्दिर को लोग ‘पैगोडा’ भी कहते हैं, जो शायद मन्दिर के गहरे काले रंग के कारण कहा जाता है।
आपको बता दें कि कोणार्क के सूर्य मन्दिर को गंग साम्राज्य के महाराजा नरसिंह देव प्रथम ने 113वीं शताब्दी में बनवाया था। बड़े रथ के आकार में बने इस मन्दिर में कई चमत्कारी लगने वाली निर्मित्तियाँ हैं, जो देखने पहुँचो तो फिर देखते ही रहो। इनमें बेहद क़ीमती धातुओं के पहिए, पिलर और दीवारें भी शामिल हैं। दिलचस्प है कि ये मन्दिर के पहिए धूप घड़ी का काम करते हैं।
Author: Amit Rajpoot
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