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अयप्पा मसागी को 'वॉटर मैजीशियन' कहा जाता है। ये कर्नाटक के गडग ज़िले के एक ग़रीब किसान परिवार में पैदा हुये थे। ये अपने बालपन से ही ये देखआ करते थए कि इनके पिता अपने खेतों में पानी के लिए तरसा करते थे। ऐसे में इन्होंने तभी से ये तय कर लिया था कि ये बड़े होकर गाँवों के विकास के लिए साइंस एंड टेक्नालॉजी के इस्तेमाल करके खेतों से पानी की कमी को पूरा करेंगे। ये कर्नाटक सहित न सिर्फ़ हमारे देश बल्कि अमेरिका, जर्मनी और जापान सरीखे देशों के लिए सौभाग्य का विषय है कि अयप्पा मसागी ऐसा कर पाये, जिनसे ये सभी पानी बचाने के उपाय सीख रहे हैं।
ये जानना बेहद दिलचस्प है कि अयप्पा के भागीरथ प्रयासों से अब तक 500 झीलें और 1,00,000 बोरवेल रिचार्ज़ हो चुके हैं। हालाँकि एक वक़्त में अयप्पा मसागी ने कर्नाटक के अपने पैतृक गांव गडाग में छह एकड़ जमीन खरीद कर उसे ही 'रिसर्च एंड डेवलपमेंट लैब' बना दिया था। मसागी धरती को एक बड़ा फिल्टर मानते हैं। वे पानी को संग्रहित करते हैं और उसे जमीन में उतार देते हैं।
इसके लिए पहले एक बड़े गड्ढे में बड़े पत्थर, बजरी, रेत और कीचड़ की मदद से एक स्ट्रक्चर खड़ा करते हैं। जब पानी गिरता है तो यह पानी बजरी और रेत से होता हुआ नीचे तक जाता है और भूमि को रिचार्ज करता है। वह प्रति एकड़ आठ ऐसी संरचना बनाते हैं। इसमें बारिश का पानी जमा होने लगता है।
मसागी बताते हैं कि पानी गड्‌ढे में जमा होने के बाद रेत और बोल्डर से छनते हुए ग्राउंड वाटर लेवल बढ़ाने लगता है। ऐसा करते हुए पूरी जमीन में ग्राउंड वाटर लेवल बढ़ने लगता है। जब जमीन पूरी तरह से पानी पी चुकी होती है तो उस खड्ढे में बुलबुले नजर आने लगते हैं। कोशिश ये रहती है कि जो पानी जमा हो रहा है, वह गर्मी के कारण स्टीम बनकर उड़ न जाए। इस तरह मसागी अब तक बीस लाख से अधिक लोगों की मदद कर चुके हैं। मसागी एक 'वॉटर लिटरेसी फाउंडेशन' भी चलाते हैं।
Author: Amit Rajpoot
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