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बीते महीने आपने नाले की गैस से चाय बनाने वाला क़िस्सा ज़रूर सुना होगा और उस पर तमाम मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ भी आपने ज़रूर देखी होंगी। इस पर उन दिनों कई सारे मीम्स भी बने थे। लेकिन आपको बता दें कि चूँकि ये बात कुछ असंभव सी या काफी नामुमकिन सी जान पड़ रही थी, इसीलिए लोगों ने इस बात का ख़ूब मज़ाक बनाया था कि नाले की गैस से कैसे चाय बन सकती है। लेकिन ये सौ फ़ीसदी मुमकिन काम है और इसे मुमकिन बनाने वाले हैं अभिषेक वर्मा, जिन्होंने सबसे पहले नाले में उठते बुलबुले और झाग को देखकर उसमें अपघटन की प्रक्रिया को पाया।
आपको बता दें कि मकैनिकल इंजीनियरिंग के छात्र अभिषेक वर्मा कानपुर के रहने वाले हैं, जो बचपन से ही विज्ञान में गहरी रुचि रखते आये हैं। बात करें इनके बचपन के क़िस्सों की तो ये बचपन में ही अक्सर बिजली के संयंत्रों को खोलकर उसके काम करने की तरीक़े को समझने का प्रयास किया करते थे। स्कूल के बाद अभिषेक वर्मा मकैनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने ग़ाज़ियाबाद आ गये। एक दिन यहाँ के सूर्यनगर नाले के नाम से मशहूर एक ख़ुले नाले में उठे बुलबुले को इन्होंने देखा और इसमें उठने वाले बुलबुले के सैंपल को प्रशिक्षण के लिए दिल्ली आईआईटी भेज दिया।
ऐसा करने के पीछे अभिषेक वर्मा का यह विचार था कि ये एक ऐसा सिस्टम तैयार करें, जिससे इसकी गैस के प्रभाव को कम करे बिना इसे निकालकर रोज़मर्रा के काम में इस्तेमाल किया जा सके। इस प्रकार इन्होंने इस प्रटोटाइप पर काम करना शुरू कर दिया। सारे शोध हो जाने के बाद जून, 2014 में इन्होंने पहली बार एक टी-स्टॉल पर अपने इस आविष्कार का प्रदर्शन किया। तब स्थानीय मीडिया ने इसे ‘गटर गैस’ का नाम देकर काफ़ी प्रशंसा की थी।
दिलचस्प बात तो यह है कि अभिषेक वर्मा के इस यूनिट सिस्टम की लागत महज 5,000 रुपये भर थी, जिससे एक बार में 100 लीटर गैस निकाली जा सकती थी।
Author: Amit Rajpoot
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