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आषाढ़ महीने का शुक्ल पक्ष भगवान जगन्नाथ की आराधना और पूजा का पक्ष होता है। इसकी त्रतीया तिथि यानी कि आज के दिन ओडीशा के पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ की भव्य रथयात्रा निकाली जाती है। आपको बता दें कि रथयात्रा निकालने की यह परम्परा सदियों पुरानी है, जिसमें तीन रथ क्रमशः भगवान कृष्ण उनके भाई बलदेव और बहन सुभद्रा की सवारी निकलती है। ये बात भी जानने योग्य है कि ओडीशा में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की काष्ठ की अर्धनिर्मित मूर्तियां स्थापित हैं, जिनका निर्माण राजा इन्द्रद्युम्न ने कराया था। ग़ौरतलब है कि आज से निकलने वाली ये रथयात्रा आगामी तीन दिनों तक चलेगी।
आपको बता दें कि जगन्नाथ मंदिर में भगवान कृष्ण, बलभद्र और सुभद्रा की काष्ठ की मूर्तियां स्थापित हैं, जिनका निर्माण राजा इन्द्रद्युम्न ने कराया था। कल्पना और किंवदंतियों में जगन्नाथ पुरी का इतिहास अनूठा है। आज भी रथयात्रा में जगन्नाथ जी को भगवान विष्णु के दशावतारों के रूप में पूजा जाता है, जिसमें विष्णु सहित भगवान कृष्ण, वामनावतार और महात्मा बुद्ध आदि भी शामिल हैं। इस प्रकार यह देखने को मिलता है कि जगन्नाथ मंदिर धार्मिक सहिष्णुता और समंवय का अद्भुत उदाहरण है।
ग़ौरतलब है कि जगन्नाथ मन्दिर में पूजा पाठ, दैनिक आचार-व्यवहार, रीति-नीति और व्यवस्थाओं को शैव, वैष्णव, बौद्ध, जैन यहाँ तक तांत्रिकों ने भी प्रभावित किया है। भुवनेश्वर के भाष्करेश्वर मन्दिर में अशोक स्तम्भ को शिव लिंग का रूप देने की कोशिश की गई है। इसी प्रकार भुवनेश्वर के ही मुक्तेश्वर और सिद्धेश्वर मन्दिर की दीवारों में शिव मूर्तियों के साथ राम, कृष्ण और अन्य देवताओं की मूर्तियाँ हैं। यहाँ जैन और बुद्ध की भी मूर्तियाँ हैं।
Author: Amit Rajpoot
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