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एक किसान भगवान बुद्ध के पास आया और बोला कि हे बुद्ध! मेरी क़िस्मत बहुत ही ख़राब है। मैं जो भी काम करता हूँ वह बिगड़ जाता है। मुझे मेरी मेहनत का कोई फल नहीं मिलता है। मैं किसान हूँ और खेती करता हूँ, लेकिन मेरी फसल अच्छी नहीं हो पाती है। इसी वजह से मैं बहुत परेशान रहता हूँ। इस बार भी मेरी फसल अच्छी नहीं हुयी है, जबकि गाँव के अन्य किसानों की फसल से उहे बहुत मुनाफ़ा दिया है। किसान बोला कि हे बुद्ध! सुना है कि आप सबसे दुःख दूर करते हैं, ऐसे में क्या आप मेरी क़िस्मत बदल सकते हैं?
बुद्ध मुस्कुराये और बोले- तुम्हारी क़िस्मत तो बहुत अच्छी है, देखो तुम्हारा शरीर कितना मज़बूत और स्वस्थ है। तुम्हारे सारे अंग भी ढंग से काम करते जान पड़ते हैं। तुम्हारा मस्तिष्क भी अच्छा काम कर रहा है। तुम्हारे पास ज़मीन भी हैं, फिर तुम्हारी क़िस्मत कैसे ख़राब है? वह किसान अकर्मण्यता का शिकार था, लिहाजा भगवान बुद्ध के सामने वह फिर से गिड़गिड़ाने लगा कि हे बुद्ध! आप कुछ ऐसा कीजिए जिससे मेरी दरिद्रता पूरी तरह से समाप्त हो जाये। हे बुद्ध! आप मेरी क़िस्मत का ख़ज़ाना खोल दीजिए।
बुद्ध ने उस व्यक्ति से कहा कि तुम्हारे खेतों में ही तो तुम्हारी क़िस्मत का ख़ज़ाना छिपा हुआ है। इसलिए जाओ और अपने खेतों की जुताई करो, बार-बार करो और जब तुम्हारे खेतों की मिट्टी भुरभुरी और उपजाऊ बन जाये तो उसमें बीज डालो और फिर देखो कैसे तुम्हारी क़िस्मत का ख़ज़ाना ख़ुल जाता है। अपने शरीर से सही समय पर सही कर्म करना किसी ख़ज़ाने के कम नहीं होता है। हम अपने शरीर से दुनिया का जो भी ख़ज़ाना है उसे आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।
Author: Amit Rajpoot
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