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19वीं सदी में एक क़िताब लिखी गयी है, जिसने भारत की क़िस्मत बदलकर रख दी थी। इस पुस्तक को लिखने वाले कोई और नहीं बल्कि आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती थे और उस पुस्तक का नाम है सत्यार्थ प्रकाश। जी हाँ, आपको बता दें कि सत्यार्थ प्रकाश 14 अध्यायों की एक क्रांतिकारी पुस्तक है। इसके अध्यायों को दयानंद ने समुल्लास कहा है। पहले 10 अध्यायों में उन्होंने व्यक्ति, परिवार, राज्य और समाज को सुचारु रुप से संचालित करने की बहस चलाई है और शेष चार अध्यायों में उन्होंने विभिन्न देशी और विदेशी धर्मों और संप्रदायों की दो-टूक समीक्षा की है।
ग़ौरतलब है कि सत्यार्थ प्रकाश का बीस से अधिक देशी और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। इसकी हजारों प्रतियों वाले सैकड़ों संस्करण हो चुके हैं और अब भी होते रहते हैं। इस ग्रंथ की मौलिकता, तर्क, पांडित्य और साहस इन चार मापदंडों पर तौलें तो शंकराचार्य की ‘सौंदर्य लहरी’, प्लेटो के ‘रिपब्लिक’, अरस्तू के ‘स्टेट्समेन’, कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’, मेकियावेली के ‘प्रिंस’, हॉब्स के ‘लेवियाथन’, हीगल का ‘फिनोमेनालॉजी ऑफ़ स्पिरिट’, कार्ल मार्क्स की ‘दास कैपिटल’ जैसे विश्व-प्रसिद्ध ग्रंथों के मुकाबले भी ‘सत्यार्थप्र काश’ अलग और भारी है।
आपको बता दें कि इस ग्रंथ ने भारत का भाग्य पलट दिया था। साल 1875 में छपे इस ग्रंथ ने भारत में आज़ादी की अलख जगाई थी, इसी ने स्वराज की सबसे पहले नींव रखी थी, बड़े-बड़े नेताओं और क्रांतिकारियों को जन्म दिया। जी हाँ, भारत में जातिविहीन, समतामूलक और कर्मप्रधान समाज की कल्पना कबीर जैसे संतों ने तो की थी, लेकिन दयानंद सरस्वती ने भारत में ऐसी पाखंड विहीन समाज की धारा बहाई, जिससे आज सभी तृप्त हो रहे हैं और उसका आधार ही है उनका सत्यार्थ प्रकाश।
Author: Amit Rajpoot
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