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मंगेश झा का जन्म बिहार के मधुबनी ज़िले में स्थित खटौना गाँव में हुआ है। लेकिन बाद में इनके माँ-बाप झारखण्ड में राँची जाकर बस गये। मंगेश ने ओडीशा के भुवनेश्वर स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट से होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई करके कोलकाता के ओबरॉय होटल में नौकरी करने लगे। लेकिन सरकारी नौकरी करने की इच्छा ने मंगेश झा को वापस राँची आने पर मजबूर कर दिया और ये वापस राँची आकर रहने लगे और यहाँ आकर फिर से ये रेडिसन होटल में फिर से नौकरी करने लगे। मंगेश झा के जीवन में बस कुछ सामान्य ढंग से चल रहा था कि एक दिन से झारखण्ड के आदिवासी इलाक़ों में ये घूमने निकले।
इस दौरान मंगेश झा को झारखण्ड की ऐसी दशा के दर्शन हुये जो इंटरनेट पर दिखने वाले झारकम्ड से एकदम जुदा था। मंगेश झा ने पाया कि यहाँ के लोग मूलभूत सुविधाओं के अभाव में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। न तो यहाँ शिक्षा का कोई आधार है और न ही रोजगार। ऐसे में मंगेश झा सोचने पर मज़बूर हो गये और इन्होंने तभी ठान लिया कि ये झारखण्ड को इस स्थिति से बाहर निकालकर लाएँगे।
इसके बाद मंगेश झा वहाँ के ग्रामीण बच्चों के साथ अपना जीवन बिताने लगे और दिनभर नौकरी के बाद वो उन बच्चों को रात में सोलर लाइट के उजाले में पढ़ाने लगे, जहाँ आसपास के सैकड़ों बच्चे आकर पढ़ने लगे। आगे सामाजिक सुधार के कार्यक्रम के वास्ते मंगेश झा ने अपनी नौकरी भी छोड़ दी और रासबेड़ा नामक गाँव में जा बसे।
यहाँ मंगेश झा को पता चला कि जब भी औरतों का महावारी होती है तो उन दिनों वे पेड़ के पत्तों, राख और गंदे कपड़े का इस्तेमाल करती हैं। मंगेश झा एकदम से चकरा गये और घर आकर इस बारे में अपनी माँ और बहन से बात की।
मंगेश की माँ और बहन ने मंगेश झा को महावारी के प्रति आदिवासी महिलाओं को जागरुक करने के बारे में न सिर्फ़ प्रेरित किया बल्कि स्वयं घर पर सेनेटरी नैपकिन बनाकर आदिवासी बच्चियों में वितरित करने में मंगेश का सहयोग भी करती हैं। महावारी के प्रति शर्म हटाने की लड़ाई में मंगेश डटे हुये हैं।
Author: Amit Rajpoot
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