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जब हम दूसरों के सहारे रहने लगते हैं यानी कि जब हमारा किसी के साथ बेहतर अटैचमेंट होने लगता है या फिर पहले से हुआ रहता है तो हम इसे हम प्यार में मानकर जायज ठहराते हैं और कहते हैं कि ये तो मेल है, जो कि काफ़ी अच्छी बात है। जबकि यह तो अलग होने का स्वाभाविक नतीजा होता है। जी हाँ, आपको बता दें कि जिस पल आप किन्हीं दो चीज़ों के साथ किसी एक को चुन लेते हैं तो उसके साथ उलझ जाना बहुत ही स्वाभाविक बात है। इतना ही नहीं ये बात भी जानने लायक है कि जब हम किसी एक ख़ास काम को करने के लिए चुनाव करते हैं, तो यह बात बख़ूबी समझ में आती है। लेकिन बाक़ी जीवन में हर पल कोई चुनाव करने की ज़रूरत नहीं है, यही शामिल करना होता है।
ग़ौरतलब है कि किसी को भी ख़ुद में शामिल करने का मतलब ये नहीं है कि आप फ़र्क ही करना भूल गये हैं। वैसे आप फ़र्क कर सकते हैं, लेकिन फ़र्क करना सिर्फ़ काम करने के लिए ही उपयोगी है। इसलिए किसी भी एक इंसान से हद से ज़्यादा अटैच हो जाने से आप स्वाभाविक रूप से दूसरों से घृणा करने लग जाते हैं और इस बात का आपको पता भी नहीं चलता है।
आपको बता दें कि किसी व्यक्ति से आपके तथाकथित प्यार को संतुलन में रखने के लिए आपको दूसरे बहुत से लोगों के साथ घृणा करनी पड़ जाती है, आप उनको सह नहीं पाते हैं। ऐसे में आपकी उम्मीदें हमेशा ये होती हैं कि आप अपने रिश्ते के लिए कैसे बेटर करें।
हालाँकि यह मेंटेंन करने की प्रवृत्ति ही आगे जाकर उस व्यक्ति के दुःख का कारण बन जाती हैं, क्योंकि यदि भौतिक जीवन में आप ज़्यादा से ज़्यादा पाना चाहते हैं, तो कभी भी उम्मीदें लगाकर न बैठें। ऐसा ही रिश्ते में भी होता है। किसी से हद से ज़्यादा प्यार करना भी एक तरह की उम्मीद है, जिसमें हम काफी कुछ पाना चाहते हैं, इसलिए बिना उम्मीद के ही लोगों से प्यार करना उचित है।
Author: Amit Rajpoot
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