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Over thinkers यानी कि ज़रूरत से अधिक सोच-विचार करने वाले लोग अक्सर गच्चा का जाते हैं। उनमें यह प्रवत्ति बनती चली जाती है, जिसका सबसे बड़ा कारण उनमें सोचते रहने की आदत है। जी हाँ, आपको बता दें कि किसी भी सामान्य स्थिति में कुछ लोग कुछ न होने के बावजूद भी उस पर विचार ही करते रह जाते हैं, फिर चाहे उस बात में या उस घटनाक्रम से उसका कोई लेना-देना हो अथवा न हो। ऐसे लोग अति संवेदनशील प्रवृत्ति के होते हैं और दूसरों पर जल्दी भरोसा करके आगे बढ़ने वाले होते हैं, लेकिन ये शक के मिज़ाज के होते हैं। ये लोग किसी भी घटना से बेहद जल्दी एकात्मता बना लेते हैं और उसको लेकर इनमें सक्रियता भी अपेक्षाकृत जल्दी आ जाती है।
आपको बता दें कि ऐसे लोग जो बहुत ज़्यादा दिमाग़ लगाते हैं और किसी भी चीज़ को लेकर ज़्यादा सोच-विचार करते रहते हैं, वो उड़ता तीर लेने के आदती भी होते हैं, जबकि भले ही उनके लिए कोई व्यूह या दुर्भावना न हो। ऐसे लोगों में भीतर ही भीतर एक डर काम कर रहा होगा है, जिसे वो पहचान भी नहीं पाते हैं और उसी डर से पार पाने के लिए ये हमेशा यह कहकर अकड़ दिखाते हैं, कि वो बड़े ही वीर हैं। इस मामले में माहाभारत का पात्र दुर्योधन सबसे बड़ा उदाहरण है।
इसलिए ऐसे लोगों को जहाँ तक हो सके Conflict को avoid करना चाहिए। वरना इसके उन्हें दुष्परिणाम देखने को मिल सकते हैं। स्वयं से विचार कीजिये कि महाभारत के युद्ध से पहले कृष्ण भी गए थे दुर्योधन के दरबार में, यह प्रस्ताव लेकर कि हम युद्ध नहीं चाहते, तुम पूरा राज्य रख लो। पाण्डवों को सिर्फ पाँच गाँव दे दो, वे चैन से रह लेंगे, तुम्हें कुछ नहीं कहेंगे। लेकिन कृष्ण को पता था कि दुर्योधन प्रोपोजल एक्सेप्ट नहीं करेगा, क्योंकि वह Over thinkers था और ऐसे लोगों के मूल चरित्र में किसी बात को स्वीकार कर लेना निरा विरुद्ध होता है।
वास्तव में कृष्ण को पता था कि दुर्योधन Over thinker है और वह मेरे किसी भी प्रस्ताव पर शंका करेगा, फिर चाहे वह भले ही उसके हित के लिए हो, लेकिन वह किसी भी तरह का प्रोपोजल अपने स्वभाव के कारण एक्सेप्ट ही नहीं करेगा। इसके लिए वह अनरीजनेबल और अन्यायी कुतर्क भी गढ़ेगा।
इस प्रयोग के बाद कृष्ण ने स्पष्ट तौर पर पाण्डवों को समझाया कि तुम कितना भी संतोषी हो जाओ, कितना भी चाहो कि तुम घर में चैन से बैठो, दुर्योधन तुमसे हर हाल में लड़ेगा ही। ऐसे में लड़ना या न लड़ना तुम्हारा ऑप्शन नहीं है। लेकिन पाण्डव बेचारे ठहरे बुद्धिमान, ख़ासकर अर्जुन। अर्जुन को आख़िर तक कौरवों पर शंका रही कि सब अपने ही तो बंधु बांधव हैं। ऐसे में युद्ध कैसे हो। इसके लिए कृष्ण ने सत्रह अध्यायों तक अर्जुन को फंडा दिया, लेकिन अर्जुन को फिर भी शंका थी।
यह वास्तव में अर्जुन का Over thinker होना ही था, जिसका उन्हें नुकसान उठाना पड़ा और अपने पुत्र अभिमन्यु की चक्रव्यूह में नृशंस मौत देखना पड़ा। इस प्रकार, इसमें कोई दो राय नही है कि ज्यादा अक्ल वालों को ही ज्यादा शंका होती है। दुर्योधन को कभी शंका नही थी, उसे हमेशा पता था कि उसे युद्ध करना ही है और इसके लिए उसने अपनी गणित लगा रखी थी।
Author: Amit Rajpoot
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