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कौशलेंद्र कुमार बिहार के नालंदा ज़िले के रहने वाले हैं, जिनके पिता एक किसान थे। उन्होंने 12वीं कक्षा के बाद इंडियन काउंसिल ऑफ़ एग्रीकल्चर रिसर्च, जूनागढ़ से एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की है। इसके बाद ये इज़राइल की एक कंपनी के लिए आंध्र प्रदेश में नौकरी के लिए चले गये। वहाँ उस कंपनी में ये एक ड्रिप-इरिगेशन सिस्टम पर चल रहे काम पर सम्मिलित थे। चूँकि कौशलेंद्र कुमार महात्मा गाँधी के ग्राम स्वराज को अपनी प्रेरणा का स्रोत मानते हैं, इसलिए उन्हें महात्मा गाँधी की वह बात बख़ूबी याद रही कि जो बदलाव हम दूसरों में देखना चाहते हैं, उसकी शुरुआत हमें ख़ुद अपने घर से करनी होगी।
बस, महात्मा गाँधी के इस विचार ने कौशलेंद्र कुमार के दिमाग़ में घर कर लिया। लिहाज ये आन्ध्र प्रदेश की अपनी नौरी छोड़कर वापस बिहार चले आये। यहाँ आकर ये किसानों की स्थित को सुधरना चाहते थे, क्योंकि इन्होंने कितानों की स्थिति पर अच्छे से रिसर्च कर रखा था, जिसमें इन्हें ये बातें जानने को मिलीं थी कि किसानों की आर्थिक स्थिति बहुत ख़राब है, इतनी कि ये अपने बच्चों को न ढंग से पढ़ा-लिखा सकते हैं और न ही उन्हें दोनो टाइम गुणवत्तापूर्ण भोजन ही करा सकते हैं।
आपको बता दें कि कौशलेंद्र का मानना है कि हर किसान की मासिक आय कम से कम इतनी हो कि वह अपने बच्चों को स्कूल भेज सके। ऐसे में कौशलेंद्र ने कौशल्या फ़ाउंडेशन की शुरुआत की, जिसके तहत इन्होंने किसानों को विभिन्न क़िस्म की फसलें गाने के लिए प्रशिक्षित करना शुरू किया, ताकि किसानों की अर्थिक स्थित मज़बूत हो और उनके बच्चों को दो जून की रोटी मिल सके और वो स्कूल जा सकें। दिलचस्प है कि कौशलेंद्र के इस प्रयास से अब तक 35,000 किसान परिवारों को फ़ायदा मिल चुका है, जिनके बच्चों ने स्कूल जाना शुरू कर दिया है।
Author: Amit Rajpoot
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