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कला आज बंद कमरों की रौनक बनकर रह गयी है, जबकि इसके रंग तो हमारी सभ्यता और समाज से निकले हैं। फिर आज ऐसी क्या बात है कि समकालीन कलाकारी में एक भी प्रतिमान खोजने से भी नहीं मिलता है, जो आज समाज में अपने रंग बिखेर रहा हो। आज तो कोई भी कलाकारी हो वह सिर्फ़ और सिर्फ़ शहरों की आर्ट गैलरीज़ में चमचमाती हुयी नज़र आती हैं। वास्तव में इन आर्ट गैलरीज़ में ये तस्वीरें और कलाकृतियाँ उतनी जीवंत नहीं हो पाती हैं, जितनी कि ये अपने मूल स्वभाव में प्रकृति के बीच स्वच्छंद होकर रहती है। इन कलाओं को ऐसा जीवन देने में जर्मनी के कलाकार फ़्रैंक लगे हुआ हैं।
जी हाँ, आपको बता दें कि इसके लिए फ़्रैंक ने हिमांचल के गुनेहड़ गाँव को चुना है, जिसे उन्होंने समकालीन कला का केन्द्र बना दिया है। यहां कला सृजन किसी स्टूडियो या बंद कमरे में गुपचुप तरीके से नहीं होता, बल्कि गुनेहड़ के किसी आंगन में, पगडंडी पर, सड़क किनारे, किसी पुरानी दुकान को अस्थायी स्टूडियो का रूप देकर, किसी घर की छत पर, तो कभी खुले में, धौलाधार की निगहबानी में होती है।
दिलचस्प है कि फ़्रैंक को एक दिन लगा था कि क्यों न शहरों की आपाधापी से दूर यहां समकालीन कला प्रदर्शित की जाए और तब उन्होंने समकालीन भारतीय कलाकारों को तलाशने के लिए गूगल किया, तो वे यह देखकर हैरान रह गये कि वहां किसी आधुनिक आर्टिस्ट का नाम सामने नहीं आता था। तभी फ़्रैंक ने ठान लिया कि आधुनिक, उदीयमान, नवोदित कलाकारों के साथ मिलकर समकालीन भारतीय कला को वे आगे बढ़ाने का काम करेंगे।
इसके लिए फ्रेंक ने हिमांचल के गुनेहड़ गाँव में आर्ट गैलरी भी खोली। इसमें उनके अलावा हांगकांग के कामलों द्वारा गांव के बच्चों की लघु फिल्म बनाकर उसे टुक टुक नामक सिनेमा में दिखाया जाता है। इस लघु फिल्म में बच्चों की सब हरकतों को रिकॉर्ड कर उनके बचपन को भी सहेजने का कार्य किया जा रहा है।
इसके अलावा गांव के पहनावे को लेकर भी ये लोग कार्य कर रहे हैं। ये शीशे के मकान बनाने, मिट्टी के मकान बनाने व पहाड़ी कला को पेंटिग द्वारा प्रचार व सहेज कर रखने का प्रयास किया जा रहा है। इसमें उन्होंने स्थानीय लोगों को भी शामिल किया है।
Author: Amit Rajpoot
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