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गुरु-पूर्णिमा गुरु के सबसे क़रीब होने का महापर्व होता है। यह आषाढ़ महीने की पूर्णिमा तिथि को मानाया जाता है। आपको बता दें कि इस दिन गुरु के सत्संग में होने वाले लोग परम् भाग्य को प्राप्त होते हैं। यहाँ सत्संग का अर्थ है सद्गुरु का सान्निध्य। सूफ़ी संत और फ़कीर व साधु इसीलिए कहते हैं कि गुरु के निकट होना ही अपने आप में काफी होता है। उसके समीप होना और उसके सानिध्य को प्राप्त होने भर से ही व्यक्ति का कल्याण हो जाता है। मसलन अपने गुरु के पास बैठना, उनके समीप चलना, उनके कमरे के बाहर बैठ जाना और रात में उनकी दीवार के पास बैठ जाना और गुरु कास्मरण करते रहने से व्यक्ति की चेतना कभी सोती नहीं है।
आपको बता दें कि ऐसा करते हुए श्रृद्धा का सघन होना आवश्यक है, क्योंकि यही श्रद्धा तो हमें संवेदनशील बनाती है और ऐसा होते ही सद्गुरु का तेज हमारे भीतर प्रवाहित होने लगता है। ये बात ग़ौर करने लायक है कि गुरु-पूर्णिमा के दिन सत्संग में न सिर्फ़ शिष्य बल्कि गुरु भी अपने शिष्य से पूरा मिलता है। वास्तव में सत्संग के इन्हीं क्षणों में गुरु पूर्णिमा के सम्पूर्ण अर्थ प्रकट होते हैं।
ये बात भी ग़ौर करने लायक है कि गुरु-पूर्णिमा के दिन गुरु को गुरु-दीक्षिणा आदि भी अर्पित किया जाना चाहिए। ऐसा इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि शिष्य जब गुरु के बताए ज्ञान-पथ पर चलते हुए आत्मज्ञान से आलोकित होकर अपने गुरु के अनुरूप दक्ष हो जाता है, तो वह अपने शिष्यत्व का कर्ज चुकाने के लिए अपने गुरुदेव को अपनी समस्त इच्छाओं को विसर्जित कर देता है। वास्तव में गुरु के ऐसे ही आदेश को पूरा करना ही असली गुरु-दक्षिणा होती है, जिसे सभी को अपने-अपने गुरु को अवश्य अर्पित करना चाहिए।
Author: Amit Rajpoot
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