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संवेदना हर उस चीज़ के साथ जुड़ जाती है, जिसमें हम अपने एहसासों से साथ स्पन्दन पैदा कर ले जाते हैं। जी हाँ, ये बात सच है कि जब हम सालों-साल एक ही कमरे में रहने लगते हैं, तो उसकी दीवारों और कमरे में नियमित रकी अनेक चीज़ों में हमारी अनुभूतियों की संवेदना भर जाती है, जिससे उनमें स्पन्दन पैदा हो जाता है। वास्तव में इसके साथ अनुभूतियों का एक पूरा संसार जुड़ा होता है या फिर जुड़ जाता है, पिर ये चीज़ें चाहें सजीव हों, या फिर निर्जीव। जी हाँ, ऐसा ही एक वाकया बुधवार को दिल्ली मेट्रो में घटा, जिसकी चारो ओर चर्चाएँ हैं।
आपको बता दें कि बुधवार को दिल्ली मेट्रो की रेड लाइन पर मेट्रो ट्रेन में एक ऐसी घटना घटी, जिसने DMRC को न सिर्फ़ भावुक कर दिया बल्कि उसे अपनी एक्टिवनेस दिखाने का भी अच्छा-ख़ासा सुनहरा मौक़ा मिल गया। दरअसल, सफ़र के दौरान एक यात्री अपने दादा की आख़िरी निशानी के तौर पर दिया गया छाता ट्रेन में ही भूल गया। अपना ये ख़ास संवेदना से जुड़ा छाता ट्रेन में भूल जाने के बाद वह व्यक्ति तना भावुक हो गया कि उसने DMRC से अपने दादा जी की आख़िरी निशानी को तलाशने की गुहार लगाई।
उस वयक्ति ने इसके लिए बाक़यादा DMRC को एक संवेदनशील पत्र लिखा जिसमें उसने लिखा था कि “वह छाता मेरे लिए बेहद महत्वपूर्ण है, दादा जी की कोई और निशानी मेरे पास नहीं है, इसलिए यह मेरे लिए बेहद ख़ास है। इससे मेरी संवेदनाएँ जुड़ी हैं...”।
उस व्यक्ति के इस भावुक ट्वीट के बाद DMRC ने ट्वीट को गंभीरता से लिया और उस छाते की खोजबीन शुरू कर दी। DMRC का मानना है कि दूसरों के लिए वह भले ही बहुत छोटी चीज़ हो लेकिन उस व्यक्ति के लिए उसके दादा जी की ये आख़िरी निशानी है, जो कि अति महत्वपूर्ण है। आपको बता दें कि DMRC ने उस छाते को महज आधे घंटे में ही ढूढ़ दिया, जिसके बाद चारो ओर DMRC की तारीफ़ हो रही है।
Author: Amit Rajpoot
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