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टीका के बग़ैर किसी भी ब्राह्मण यानी कि ब्रह्म को जानने वाले व्यक्ति का मस्तक देखना हमारी वैदिक और शास्त्रीय परंपरा में वर्जित माना जाता है। यानी कि यदि कोई भी विद्वान व्यक्ति यदि अपने मस्तक में टीका नहीं लगाया हुआ है तो उसकी विद्वता पर लोगों को शक होता है और माना जाता है कि यह या तो विद्वान नहीं है, फ़र्जी विद्वान होने का नाटक कर रहा है अथवा यदि यह विद्वान है तो फिर बेहद विनाशकारी इंसान है। जी हाँ, ऐसे मं आप माथे पर भ्रू-मध्य में टीका लगाने की महत्ता का अंदाज़ा लगा सकते हैं।
आपको बता दें कि तंत्रमार्ग में टीका सिर्फ़ परंपरा के कारण नहीं लगाया जाता, बल्कि इसके पीछे पूरा विज्ञान है। वास्तव में वह ललाट पर ईष्ट का प्रतीक होता है। ये बात ग़ौर करने लायक है कि जोनों भौहों के बीच में कुछ जगह ख़ासतौर पर जिसे हम भ्रू-मध्य कहते हैं, वह बेहद संवेदनशील होती है। यहि आप आँखें बंद करके बैठ जायें और कोई दूसरा व्यक्ति भ्रू-मध्य के पास अपनी तर्जनी उंगली ले जाये तो वहाँ हमें कुछ विचित्र अनुभव होगा। ध्यान देने वाली बात है कि यही तीसरे नेत्र की प्रतीति है। इस संवेदना को दोनों भौहों के बीचोबीच उँगली लाकर भी आप अच्छी तरह से अनुभव कर सकते हैं।
आपको बता दें कि दोनों भौहों के बीचो-बीच टीका लगाने से शरीर व्यापी चेतना आज्ञाचक्र पर इकट्ठी होने लगती है। जिस जगह पर हम टीका लगाते हैं उस तिलक बिन्दु पर इकट्ठा होना ठीक वैसे ही है, जैसे कि आतिशी शीशे से सूरज की किरणों को काग़ज़ के एक बिन्दु पर केन्द्रीभूत करना।
Author: Amit Rajpoot
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