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ग़रीबी एक ऐसी बला है, जो लोगों को उनसे ही दूर कर देती हैं। जी हाँ, अक्सर ऐसा होता है कि ग़रीबी में पले-बढ़े प्रतिभाशाली लोग अपने हुनर को सिर्फ़ सलिए नहीं निखार पाते हैं, क्योंकि वह ग़रीब होते हैं। ऐसे में उन्हें सही संसाधान और सही माहौल नसीब नहीं होता है, जिसके चलते उनकी प्रतिभा दम तोड़ देती है। लेकिन ,सच्चाई तो यह है कि हुनर कभी हारता ही नहीं है, हारते तो हालात हैं और ज़्यादातर लोग उसमें फँसते चले जाते हैं। लेकिन आज हम आपको जिस शख़्स से परिचित कराने जा रहे हैं उन्होंने ग़रीबी को मात देकर अपनी प्रतिभा को ऐसे निखारा की उनके हुनर ने दुनिया को रंगीन बना दिया है।
जी हाँ, हम बात कर रहे हैं पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना में जन्मी शकीला शेख की। शकीला शेख शकीला बहुत छोटी थी जब उनके पिता उन्हें छोड़ कर चले गए थे। पिता के छोड़ने के बाद उनकी मां सब्जी बेचने के लिए 40 किलोमीटर मोगरा घाट से चलकर कोलकाता तक जाती थी। शकीला का कहना है कि उनकी मां उन्हें साथ तो ले जाती थी लेकिन कोई काम करने नहीं देती थी। वह फ़ुटपाथ पर बैठकर ट्राम और बसों को देखा करती थी और कई बार तो काम के लिए उन्हें सड़को पर ही सोना पड़ता था।
लेकिन फिर एक दिन एक शख़्स पनेसर के रूप में उन्हें गुरू मिल गये। वह एक पेंटर थे। उन्होंने शकीला शेख की बड़ी मदद की। उन्हें पढ़ाया-लिखाया और आगे जाकर उनकी प्रतिभा को निखारा भी। अब शकीला शेख स्वयं एक पेंटर हैं।
अपनी कला के लिए उन्हें कई अवार्ड्स भी प्राप्त हुए। साल 2003 में उन्हें ललित कला अकादमी फेलिसीटेशन और 2005 में चरुकला अवार्ड से नवाजा गया। आज के समय में उनका काम फ्रांस, जर्मनी, नॉर्वे और अमेरिका जैसे देशों में सरहाया जाता है। यक़ीनन शकीला शेख उन सबी के लिए एक प्रेरमा हैं, जो ग़रीबी के चलते अपने हुनर को पंख नहीं दे पाते।
Author: Amit Rajpoot
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